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मोदीजी, सब पूछते रहे रोने का कारण, बाघ रोता रहा रात-भर...
modi tiger

उमेश त्रिवेदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी छत्तीसगढ़ के स्थापना दिवस पर नंदनवन में जंगल-सफारी के दौरान खुद को एक टायगर का फोटो लेने से नही रोक सके। वाइल्ड लाईफ फोटोग्राफी पर मोदी की यह आजमाइश दिन पर सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय रही। सोशल मीडिया पर बाघ का फोटो खीचते साझा तस्वीर पर कई प्रतिक्रियाएं आई हैं। ट्वीटर-ट्रेड में उनके फॉलोअर्स व्दारा उन्हे ‘शेर के आगे उन्हे बब्बर शेर’ या ‘शेर का सवा शेर’ कहा जाने में कुछ भी अनपेक्षित नही हैं। लेकिन टायगर को फोटो खींचते हुए मोदी के फोटो की न्यूज-वेल्यु के साथ ही उसकी टाइमिंग भी गजब की है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमनसिंह ने ‘मोदी को बाघ को अपने कैमरे मे कैद करते हुए अपने कैमरे में कैद किया है।‘ तस्वीर में मोदी और बाघ आमने-सामने हैं। मोदी आश्वस्त लगते है कि टायगर उनकी मर्जी के मुताबिक पोज देकर उनकी हसरतो को पूरा करेगा। मोदी शेर से आंखे मिला रहे हैं या शेर मोदी पर गुर्रा रहा है, समझ पाना मुश्किल है। लेकिन दोनो की बॉडी लैंग्वेज में गरूर और गुर्राहट के भाव जरूर झलक रहे हैं। 800 एकड़ से ज्यादा इलाके में फैला जंगल सफारी छत्तीसगढ़ की प्रमुख परियोजना है।          

मोदी की वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी की आकस्मिक घटना बाघ-संरक्षण के लिए प्रेरक प्रसंग हो सकती है, लेकिन सही अर्थो में मोदी और बाघ के इस साक्षात्कार से अलग बाघों की दुनिया मे झांकने भी जरूरी है। पिछले साल-डेढ़ साल से भोपाल के आसपास जंगलो में खासतौर से कलियासोत के जंगलो में बाघ के मूवमेंट की खबरें आ रही हैं। लोग इसलिए दहशतजदा हैं कि बाघ आदमखोर है।  लोग उसके पैरों के निशान से उसकी शिनाख्त करते हैं, ठिकाने ढूंढते है, गांव वाले बचने के उपाय करते हैं। कुछ दिन गांब के आसपास ठहरने के बाद बाघ फिर गुम हो जाता है। उसका गुम होना बताता है कि वो भी दहशतजदा है और अपने लिए सुरक्षित ठिकानों की तलाश में पहाड़-कंदराओं और जलस्रोतों के लिए भटक रहा है। प्रकृति का चक्र उलटके हुए शहर जंगल की ओर भाग रहे हैं और जंगल निगल रहे हैं। मीडिया कहता है कि आदमखोर बाघ शहरो की बस्तियों में आतंक का फैला रहे हैं, जबकि वस्तु-स्थिति यह है कि जंगलखोर इंसान वन्य प्राणियो के लिए आरक्षित जंगलो में अवैध घुसपैट करके आतंक फैला रहें हैं। 

बाघ को केन्द्र मे रख कर हिन्दी-कवि केदारनाथ सिंह ने 21 श्रृखंलाओं में कविताएं लिखी हैं। जंगलो पर इंसानों के अवैध कब्जे को लेकर पैदा असंतुलन के बीच जंगल,जमीन और जानवर कंहा खड़े हैं, इसके दर्दे को महसूस करने के लिए यह कविता काफी है। केदारनाथ सिंह ने  कविता के दसवें खंड में बाघ के रोने का वर्णन कुछ यो किया है-- ‘’उस दिन बाघ / रोता रहा रात भर  / सबसे पहले एक लोमड़ी आई / और उसने पूछा / रोने का कारण / फिर खरगोश आया / भालू आया / सांप आया / तितली आई / सब आए / और सब पूछते रहे / रोने का कारण / पर बाघ हिला न डुला / बस रोता रहा / रात-भर''। 

बाघ के लिए अपना दर्द किसके सामने बयान करे...मार्मिक शोक-गीत की तरह ये पंक्तियाँ कहती है कि –‘ इंसानो, कुछ समझ सको तो समझो, ये हैरानी-परेशानी बेवजह नही हैं, इसके वजूद में आप हैं...।' प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक क्लिक के साथ यह आवाज भी लोगों तक, उनके ट्वीटर समर्थकों तक पहुंचना भी जरूरी है।[लेखक भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]

MadhyaBharat 4 November 2016

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