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उत्तरआधुनिकता और गांधी
उत्तरआधुनिकता और गांधी
मनोज कुमारक्या उत्तरआधुनिकता एक तरह की बौद्धिक झांसेबाजी है ? क्या वह सिर्फ एक शगल है जिसके जरिए अस्पष्टता के आतंक से पाठक, श्रोता, दर्शक को अर्धमूर्छित किया जा सकता है ? या इन सबसे कहीं अधिक वह किसी समय' में संस्थित है ? क्या हम इस अवधि को सही-सही चिन्हित कर सकते हैं ? सच तो यह है कि आज हम अन्तरावधि में हैं जब आधुनिकता बुढ़ा रही है और उत्तरआधुनिकता के दांत आ रहे हैं । जिस तरह से नए' को एक कमोडिटी बना दिया गया है, आधुनिक' होना मौलिक होना नहीं रह गया है । हम रूढ़ियों की बात करते हैं जिनमें अनुकरण का मनोविज्ञान होता है, लेकिन अनुकरण का यही मनोविज्ञान तो उन चीजों में भी चरितार्थ होता है जिन्हें फैशन कहते हैं । गांधी जी इस चीज को १९०८ में पहचान गए थे जिसे ग्लोबलाइजेशन की फैशनेबल चकाचौंध में न्यस्त हमारे पुरोधा आज तक नहीं पहचान पाए । उन्होंने हिन्द स्वराज' में तब लिखा था कि They wish to convert the whole world into a vast marlet for their goods. They will leave no stone unturned to reach the goal. गांधी जी ने आधुनिक सभ्यता के उस कमोडिटी रश '' को अपनी किन आंखों से उसी वक्त देख लिया था । १९१७ में रूडोल्फ पानविट्ज ने उत्तर आधुनिकता को एक दर्शनिक तौर पर अभिमुखी संस्कृति'' (Philosophically oriented culture) कहा था । उनसे ९ साल पूर्व गांधी ने मास्टर्स ऑफ इंडियन फिलासफी '' को, भारतीय दर्शन के प्रतीक पुरूषों को, अपनी पुस्तक हिन्द स्वराज की प्रेरणा बताया था, अपनी उस पुस्तक की प्रेरणा जो आधुनिक सभ्यता का निर्मम क्रिटीक पेश करती है । ब्रिटिश सरकार के द्वारा इस पुस्तक को १९१० में जप्त किये जाने को गांधी ने ब्रिटिश सरकार जिस सभ्यता का प्रतिनिधित्व करती है, उसका एक और अवगणन - Further condemnation बताया था । गांधी की लड़ाई किसी रूप में पॉलिटिकल नहीं थी । यह लड़ाई सिविलाइजेशनल थी । यहाँ एक देश दूसरे देश का अस्वीकार नहीं कर रहा था । यहाँ एक सभ्यता दूसरी कथित सभ्यता को अस्वीकार कर रही थी । पश्चिमी सभ्यता ' - गांधी जी को ये शब्दयुग्म ही मजाकिया और विरोधाभासी लगा था । हिंद स्वराज में वे आधुनिक सभ्यता को किंगडम ऑफ सैटन ' कहते हैं - शैतान का साम्राज्य । वे प्राचीन सभ्यता को किंगडम ऑफ गॉड ' कहकर उससे कन्ट्रार जरूर करते हैं, लेकिन इसका आशय यह नहीं था कि वे पूर्वाधुनिक थे, अतीतग्रस्त थे या भूतबाधाग्रस्त । वे कई तरह से उत्तरआधुनिक संवेदना और सोच को जन्म दे रहे थे । यह ध्यान दें कि विज्ञापन पर हमला सिर्फ गांधी ने ही नहीं किया, उत्तरआधुनिकों ने भी किया । उनके अनुसार वैज्ञानिकों के प्रिटेन्शन्स औचित्यहीन हैं, कि वैज्ञानिक भी यथार्थ का अन्वेषण नहीं करते, उसे कन्स्ट्रक्ट करते हैं । क्या बुश के एक वरिष्ठ परामर्शदाता ने भी ऐसा ही नहीं कहा ^ (You people) in what we call the reality based community ... belive that solutions emerge from your judicious study of discernible reality. That,s not the way the world really works anymore. We're ar empire now and when we act, we create our own reality. सत्याग्रही गांधी जी ने सत्य को संप्रभु सिद्धांत (Sovereign Principle) कहा था, उन्हें क्या पता था कि संप्रभुता सत्य को निर्मित करने लगेगी । गांधी के लिए सत्य विज्ञान या तर्क मात्र से पकड़ में आने वाली चीज नहीं था । गांधी जी के अनुसार तो सत्यान्वेषी को धूल से भी ज्यादा विनम्र होना चाहिए और यहाँ तो वी आर एन एंपायर नाउ'' की दर्पोक्ति है । सत्य यों तो ईश्वर की पुत्री कहा गया, लेकिन अब तो सत्य साम्राज्य की चाकरी करते नजर आता है । उधर गांधी के शब्दों में I have no God to serve but Truth. गांधी सत्य की चाकरी कर रहे थे । ईश्वर को भी सत्य की सृष्टि का गर्व न होगा, लेकिन साम्राज्य को सत्य के सृजन का, उसकी मैनुफेक्चरिंग की अपनी ताकत का गर्व जरूर है । साम्राज्य' के सामने गांधी जी लघु ग्राम गणतंत्रों को पेश कर रहे थे । ये ग्राम गणतंत्र, आइरिस मर्डोक के शब्दों में यदि प्रयोग करने की अनुमति मिले । किसी तरक की खंडित पूर्णता '' (ब्रोकन टोटलिटी) नहीं थे बल्कि समकेन्द्रित कृत्त थे । गांधी जी की तरह उत्तरआधुनिक भी इस नतीजे पर पहुँचे कि एटम बम, क्वांटम मैकेनिक्स, जेनेटिक इंजीनियरिंग, ग्लोबल क्लाइमेट आदि का हमारी वैज्ञानिक ज्ञान पश्चिमी राजनैतिक और सैनिक उद्देश्यों के अनुसरण में विकसित हुआ । जिस तरह से गांधी को पश्चिमी सभ्यता शब्द ही व्यंग्यात्मक लगता था, उसी तरह से जॉन हार्गन जैसे उत्तर आधुनिक अपनी द एंड ऑफ साइंस फेसिंग : द लिमिट्स ऑफ नॉलिज में '' आयरनिक साइंस या व्यंग्यात्मक विज्ञान की बात कर रहे हैं । गांधी जी ने आधुनिक चिकित्सा की घनघोर आलोचना की, लेकिन क्या कुछ वैसा ही काम ईवान ईलिच ने मेडिकल निमेसिस ' में नहीं किया ? वही ईलिच जो बाद में जाकर गांधी जी की झोपड़ी में रहे । तर्क की संप्रभुता के प्रति अश्रद्धा (irreverence towards reason) उत्तरआधुनिक लेखक कार्ल बार्थ में भी गांधी से कम नहीं देखी गई । हालांकि बार्थ का काम हिंद स्वराज के दो दशक बाद का है । गांधीजी तब लिख रहे थे I plead not for the suppression of reason, but for a due recognition of that in us which sanctifies reason itself.उत्तरआधुनिकता में जो मिनिमलिज्म है - जिसके चलते कार्ल आन्दे्र ने लंदन की टेट गैलरी में ईंटों का आयताकार ढेर चित्रित कर दिया था - जो एलीमेंटरी होने के लिए डिजाइन किया जाता है, क्या वह हमें गांधी के उस जीवन-दर्शन और उसके उस देह-धरे के धम्म में नहीं मिलता जो सृष्टि सो न्यूनतम मांग करता है । सिर्फ एक लंगोटी में काम चलाने वाले गांधी आधुनिकता के उपभोक्तावादी जीवनाग्रहों का प्रतिलोम थे । सच्चे मिनिमलिस्ट । सन् २००१ में मार्टिन क्रीड ने अपनी जिस मिनिमलिस्ट कलाकृति के लिये टर्नर पुरस्कार जीता, उसमें बस एक खाली कमरा है । बहुत कुछ भर लेते और ठूँस लेने की जिद पकड़े आधुनिकता के विरूद्ध गांधी का जीवन भी इस खाली कमरे की तरह है । बहुत कुछ शून्य अपने चित्ताकाश में सिरजता हुआ। पूंजी के परिग्रह के ठीक वैपरीत्य में । कहा जा सकता है कि मिनिमलिज्म की उत्तर-आधुनिकता का सीधा संबंध अपरिग्रह और शून्यवाद से है । तो यह उत्तर आधुनिकों के लिए इतिहास समय की किसी धारा से छूट जाना है । उत्तराधुनिक सिर्फ व्यक्तिगत ही नहीं है, वे राज्य या समाज के सवालों का भी साक्षात् करते हैं । ध्यान दें कि गांधी न सिर्फ अपनी जीवन शैली को मिर्निमलिस्ट बना रहे थे बल्कि उनका राजकीय आदर्श भी एक मिनिमलिस्ट स्टेट का था । हालांकि गांधी देरिदा की तरह जटिल नहीं हैं और इस रूप में उससे भी ज्यादा उत्तरआधुनिक हैं, लेकिन उन्होंने भी हिन्द स्वराज ' में आधुनिक पश्चिमी जीवन को बहुत बेबाकी से डिकंस्ट्रक्ट किया । पश्चिमी इंटेलेक्चुअल फ्रेमवर्क का इतना आक्रामक डिकंस्ट्रक्शन इस छोटी सी पुस्तक में मिलता है कि आधुनिक बुद्धिजीवी के पास गांधी को पोंगापंथी कहकर खारिज करके बच निकलने के सिवा कोई मार्ग नहीं । एक दूसरे उत्तरआधुनिकतावादी लायोटार्ड ग्रांड नैरेटिव्स, मास्टर नैरेटिव्स, मास्टर नैरेटिव्स, ' या मेटानैरिटिव्स ' के प्रति अविश्वास को उत्तरआधुनिक होना मानते हैं । अपनी पुस्तक ला कंडीशन पोस्ट मार्डेन ' में वे कहते हैं कि " Simplifying to the extreme, I define, postmodern as the incredulity towaeds metanarratives. " गांधी ने भी हिन्द स्वराज में विज्ञान, आधुनिकता, पश्चिम और श्वेत आदमी का भार जैसे मेटानैरेटिव्स के प्रति अविश्वास प्रकट किया, इन्क्रेदुलिटी प्रदर्शित की । ऐसा नहीं है कि गांधीजी पश्चिमी-पूर्वी सभ्यताओं के रूप में या आधुनिक-प्राचीन सभ्यताओं के प्रति द्वैतात्मक विश्व-रूपों, dualirtic world-forms की बात के जरिए जरूरत से ज्यादा सरलीकरण कर रहे थे । लेकिन कुछ बातों को वे बिना लाग लपेट के, बिना कोई मुरौव्वत पाले रख जरूर देना चाहते थे । वह इसलिए कि जो डुअलिज्म भी था, एक आक्रामक सभ्यता उसे भी खत्म कर सिर्फ एक ' का ही सार्वत्रिक स्वीकार और प्रचार चाहती थी । मार्क्सवाद के मेटानैरेटिव पर भी उनकी अनास्था थी क्योंकि वह भी एक तरह का टोटलाइजिंग अनुभव था जो राज्य के बाहुबलीकरण की ही ओर ले जाता है । गांधी बहुत बहादुरी से इनके प्रति असंतुष्ट हुए । उनकी विशिष्टता इस बात में है कि वे इन मेटानैरेटिव्स के द्वारा हाशिए में डाल दिए और मातहत बना लिये गये छोटे आदमी की ओर से बोले । लोगों को गांधी आस्थावादी नजर आते हैं, लेकिन हिंद स्वराज में गांधी के तर्क से कहीं ज्यादा उनका scepticism, उनका संशयी मन मेरा ध्यान खींचता है । साम्राज्यवाद के पश्चिमी भव्य वृत्तंत के प्रक्षेपण के सारे प्रयासों का, उसकी सारी विकृतियों का पर्दाफाश गांधी तब भी करते हैं जब वे जानते हैं कि वे अकेले पड़ जायेंगे, अलग-थलग पड़ जायेंगे । लेकिन वे अपने जीवनकाल में यह भी सिद्ध करते हैं उन्हें अलग-थलग कर देना इतना आसान भी नहीं है । उन्हीं मार्जिनलाइज्ड और सबआर्डिनेटेड लोगों को साथ लेकर वे दुनिया के सबसे बड़े जनअभियान को शुरू करते हैं । ये असहयोग और अवज्ञा के आन्दोलन हैं । इनकी भाषा एक अनास्थावादी और विद्रोही आत्मा की भाषा है । यह भी देखिए कि ऐसे गांधी को पाठ्यपुस्तकों में कैसे पालतू, कैसे डामेस्टिकेटेड रूप में प्रदर्शित किया जाता है । यह भी देखें कि भारत की आस्थावादी समझी जाने वाली जनता पर ...................... की अपील कितनी ज्यादा होती है । विज्ञान और आधुनिकता से समृद्धि, सुख और संतोष की ट्रस्टेड रिलेशनशिप को हिंद स्वराज में गांधीजी छितरा देते हैं । वे अवधारणात्मक पद्धतियां जिनकी करेक्टनेस ' को लेकर नेहरू आदि इस हद तक आश्वस्त थे कि हिंद स्वराज के ५० साल बाद भी वे उस मोहभंग की सृजनात्मक पीड़ा से नहीं गुजरे जिससे गांधी गुजरे थे - इस पुस्तक में गांधी के डिकंस्ट्रक्टिंग क्वेश्चंस के आगे पनाह मांगती है । आधुनिकता की लगभग सर्वमान्य होती जा रही निष्पत्तियों के विरूद्ध गांधी एक सबवर्सिव भूमिका निभाते हुए यहाँ नजर आते हैं । ध्यान दें कि गांधी इसा पुस्तक में अनरेस्ट ' और डिस्कंटेंट' को उपयोगी मानते हैं और यह कहते हैं कि असंतोष किसी भी सुधार की भूमिका निर्मित करता है । लोगों को लगता है कि गांधीजी नरम मुलायम भाषा बोलते थे । हिंद स्वराज में वे ब्रिटिश पॉर्लियामेंट को बांझ और वैश्या दोनों बोलते हैं । इसकी तुलना में रवीन्द्रनाथ टैगोर की भाषा कहीं अधिक विधायी और सकारात्मक है । रवीन्द्र ५ मार्च १९२१ को शिकागो से लिखे अपने एक पत्र में कहते हैं नियति का व्यंग्य यह है कि मैं समन्दर के इस पार पश्चिमी और पूर्वी के बीच संस्कृतियों के सहयोग के लिए उस पल काम कर रहा हूँ जब उस पार असहयोग का सिद्धांत पढ़ाया जा रहा है ।''गांधी जी के असहयोग ' का यह आंदोलन और यह भाषा रवीन्द्र के इस कथन के आलोक में और रौशन होकर उभरती है । गांधी कुछ Irreconcilables पहचान गए थे और उसके बारे में निपट फक्कड़ और औघड़ तरीके से मुखर भी हो जाते थे । ब्रिटिश और पश्चिम से अपनी और अपनों की Incompatability पर वे कतई डिफेन्सिव नहीं थे और इस मायने में उनकी भाषा अपने गुरू गोखले और अपने शिष्य नेहरू दोनों से सिर्फ भिन्न ही नहीं थी, बल्कि ज्यादा पेनी, बेलाग और नुकीली थी । इसी कारण गांधी जी अन्य ज्यादा सिविल लोगों के मुकाबले भारतीय जनता को ज्यादा रैडिकलाइज कर पाए । भाषिक समृद्धि के स्तर पर गोखले, गुरूदेव और नेहरू तीनों गांधी से कहीं आगे थे, लेकिन भारत की आम जनता को गांधी की भाषा ज्यादा पल्ले पड़ी क्योंकि वह भाषा निगोशिएशन की भाषा नहीं थी, वह असहयोग और अवज्ञा के प्रति क्षमा प्रार्थी भाषा नहीं थी । भले ही वह अवज्ञा दुर्विनीत न होकर सविनय हो लेकिन भी वह अवज्ञा ही । बाद में चेकोस्लोवाकिया की मखमली क्रांति, बाल्टिक देशों की गाती हुई क्रांति '' और अभी २००४ की संतरा क्रांति (उक्रेन) और गुलाब क्रांति (जार्जिया) हमें अपनी प्रकृति में उत्तर आधुनिक जान पड़ेंगी, लेकिन उनके बीज हैं गांधी के तौर तरीकों में । बाद में गांधी सिविल डिस्ओबिडिएंस को सिविल रेसिस्टेंस कहने लगे लेकिन महत्वपूर्ण है असहयोग, अवज्ञा, प्रतिरोध जैसे शब्दों पर गांधी की आस्था । हमारे सामने आज भी यह प्रश्न है कि हम उत्तर-औपनिवेशिक युग में रह रहे हैं या नव-औपनिवेशिक युग में रह रहे हैं या नव-औपनिवेशिक युग में । गांधी जी के हिंद स्वराज के मानदण्डों से यदि हम इस प्रश्न को हल करने की कोशिश करें तो यह उत्तर जल्दी प्राप्त हो सकेगा । स्वराज गांधी के लिए गुजराती का एक ऐसा शब्द था जिनका एक आत्मानुशासन था तो दूसरा अर्थ स्वतंत्रता या स्वायत्तता था । पश्चिम भारतीय स्व' के इन दिनों ही रूपों के विरूद्ध था । पश्चिमी सभ्यता विश्वास तो यह करती थी कि ईश्वर ने मनुष्य को अपनी शकल में गढ़ा, लेकिन किया उसने यह कि तमाम देसी सभ्यताएँ खुद अपनी इमेज में गढ़ीं यह काम अस्वाभाविक तो था ही, इसे झेलने वाली सभ्यताओं के ब्लीडिंग भी बहुत हुई । गांधी की पश्चिम के प्रति कोई कंजर्वेटिव वितृष्णा नहीं थी । वे गंभीरता से महसूस करते थे कि यह पश्चिमी दुनिया सभ्यता कहलाने की लेजिटिमेसी खो चुकी है । यदि किसी आधुनिकता के प्रति गांधीजी के मन में कोई सम्मान था भी तो वह एक सार्वभौम, एक यूनिवर्सल किस्म की आधुनिकता थी और जो पश्चात्य ' के पर्याय के रूप में वापसरी नहीं जा सकती थी । पाश्चात्य इसी अर्थ में आधुनिक था कि उसका कोई उल्लेख्य अतीत ही न था, लेकिन भारत की आधुनिकता वक्त के एक सतत प्रवाह की आधुनिकता थी । भारत को पाश्चात्य का क्लोन बनाए जाने की कोशिशों को गांधीजी हिंदस्वराज में ठीक-ठीक ताड़ जाते हैं । गांधी जी यह भी ताड़ते हैं कि जो वेस्टर्न है, वह सिर्फ सिविलाइजेशन नहीं है, सिविलाइजिंग भी है । यानी उसका दावा सिर्फ सभ्यता होने का नहीं है, सभ्य बनाने का भी है । गांधी पाश्चात्य का आधुनिक से कोई स्वचलित सम्बन्ध स्वीकार नहीं कर सकते थे, हालांकि कई जगह उन्होंने आधुनिक सभ्यता को जो लताड़ा है, वह लताड़ वस्तुतः पाश्चात्य को है । लेकिन उससे कहीं ज्यादा बड़ा उनका अस्वीकार पश्चिम की सिविलाइजिंग' भूमिका के दावे को लेकर था । जो सभ्य हुए नहीं, वे सभ्य बनाने चले हैं - गांधीजी ने इस बात को बेपर्दा कर दिया । सिर्फ दर्शन के स्तर पर ऐसा करने की तैयारी और इच्छा गांधी जी की नहीं थी, वे तो इसे घटता हुआ दिखाना चाहते थे । जो दूसरों को गुलाम बनाता हो, वह सभ्य कैसे हो सकता है । जो निहत्थे सत्याग्रहियों पर कोड़ों और लाठियों की बारिश करता है, वह सभ्य कैसे हो सकता है ? जलियांवाला बाग के बाद तो स्वयं अंग्रेजों के मन में अपने सभ्य होने के प्रति गहरा संशय पैदा हो गया । गांधी के सविनय '' की कोमल रोशनी के ठीक सामने अंग्रेजों का दर्प और धृष्टता एकदम स्पष्ट दिखाई देने लगी । यह रोशनी एकदम चकाचौंध करने वाली होती तो शायद उसमें कुछ नहीं दिखाई देता । अंग्रेजों का औद्धत्य और प्रमाद भी उसमें छिप जाता । लेकिन इस कोमल रोशनी ने सब गड़बड़ कर दी । इसलिए जो लोग हिंद स्वराज को एक वैचारिक दृष्टि भर मानते हैं, उसे एक्शनेबल नहीं । वे ध्यान से गांधीजी के जीवन, उनकी राजनीति, उनकी गतिविधियों को वाच ' करें, गांधी किस तरह से हिंद स्वराज का एक सफल कर्मानुवाद संभव कर दिखाते हैं । हिंद स्वराज गांध के संघर्ष की मेटाफिजिक्स है
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