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और बीजेपी की तिकड़ी टूट गई...
और बीजेपी की तिकड़ी टूट गई...
राकेश अग्ग्निहोत्रीअरविन्द मेनन की मध्यप्रदेश से रवानगी के साथ अंततः बीजेपी की वो तिकड़ी टूट गई जिसने मिशन-2018 को लेकर मध्यप्रदेश में जमावट शुरू कर दी थी। नंदकुमार सिंह चौहान के भोपाल में उनकी तारीफ में कसीदे कढ़ने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने भी नागपुर में मेनन की नई जिम्मेदारी दिल्ली में संभालने पर अपनी मुहर लगाकर उस मामले का पटाक्षेप कर दिया जिसे नागपुर यात्रा से जोड़कर हवा दी जा रही थी। इस बीच भोपाल से लेकर नागपुर ही नहीं, दिल्ली में भी बंद कमरों में हुई मेल-मुलाकातों ने बीजेपी की अंदरूनी सियासत को गरमा दिया है तो चर्चा अब पीएम नरेंद्र मोदी के महू दौरे के बाद सुहास भगत की बीजेपी में इंट्री और नंदकुमार सिंह चौहान की नई टीम के सामने आने की शुरू हो गई है जिसके बाद साफ संकेत मिलने लगेंगे कि संघ की प्रदेश बीजेपी के सत्ता और संगठन से क्या अपेक्षाएं हैं जो बेहतर समन्वय का दावा करता रहा है। ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि क्या नंदूभैया की नई टीम का रास्ता साफ हो गया है तो सुहास भगत पहले अपनी जिम्मेदारी संभालेंगे या फिर उनके नाम का ऐलान नंदूभैया की टीम के साथ होगी।सूबे की िसयासत में तमाम मुद्दों पर शिवराज सिंह की नागपुर यात्रा भारी पड़ी जहां से लौटने के बाद मुख्यमंत्री अपनी पत्नी के साथ सीधे विजयासन देवी के दर्शन करने सलकनपुर पहुंचे और बाद में सभी बैठक निरस्त कर विदिशा के उस फार्म हाउस जा पहुंचे जहां उन्होंने लंबा वक्त बिताया, जिसके बाद वो भोपाल लौट आए। शिवराज जब नागपुर में संघ के सह सरकार्यवाह भैयाजी जोशी से मुलाकात कर रहे थे तब प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान का भोपाल में संघ कार्यालय समिधा से बुलावा आ गया था जहां उन्होंने क्षेत्र प्रचारक अरुण जैन से चर्चा की तो दिल्ली में भी मध्यप्रदेश से जुड़े एक बड़े नेता ने झंडेवाला जाकर संघ पदाधिकारियों से विचार विमर्श किया। कुल मिलाकर इन मुलाकातों का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि मेनन की रवानगी के लिए अमित शाह के निर्देश पर अरुण सिंह की नंदूभैया के नाम लिखी चिट्ठी मीडिया तक पहुंचाई गई जिसके बाद संगठन महामंत्री अरविन्द मेनन को दिल्ली की बजाए नागपुर का रुख करना पड़ा जहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भी पहुंचे। शिवराज की एक हफ्ते में इस दूसरी नागपुर यात्रा का मकसद सिंहस्थ में होने वाले वैचारिक महाकुंभ की तैयारियों और उसके एजेंडे से जोड़कर प्रचारित किया जा रहा है लेकिन मेनन की भी वहां मौजदूगी कुछ और संकेत देती है जिसे उनकी नई भूमिका में आ रहे पेंच से जोड़कर देखा जा सकता है। शिवराज ने जिस तरह नागपुर में मीडिया के सवाल के जवाब में मेनन की नई भूमिका पर किंतु-परंतु और खड़े किए जा रहे सवाल पर अपनी रजामंदी जािहर की उसके बाद अब सबकी नजर संघ द्वारा लिखी गई उस पटकथा पर केंद्रित होकर रह गई है जिसके अगले पड़ाव को लेकर कयासबाजी शुरू हो गई है। चर्चा का बिन्दू इन दिनों अरविन्द मेनन हैं जिन्हें बेटी बचाओ, स्वच्छता मिशन, आजीवन सहयोग निधि जैसे 21 प्रकल्पों का प्रभार सौंपा गया है लेकिन यहीं पर वो बड़ा सवाल खड़ा होता है जिसने मेनन की चिंता में इजाफा कर दिया तो शिवराज की सहानुभूति भी उनके साथ है। दरअसल मेनन की बदलती भूमिका के साथ संघ को ये फैसला करना है कि अरविन्द मेनन प्रचारक बने रहेंगे या फिर पूरी तरह उनकी सेवाएं बीजेपी को सौंप दी जाएंगी जैसा कि पूर्व में माखन सिंह, कप्तान सिंह और कृष्णमुरारी मोघे के साथ हुआ और इन्होंने अलग-अलग रास्ते से ही सही बीजेपी में रहकर लालबत्ती का सुख हासिल किया। शायद मेनन ये चाहते हैं कि संगठन महामंत्री रहते उन्हें प्रचारक घोषित कर संघ ने जो ठप्पा लगाया था वो कायम रहे जिससे उन्हें भविष्य में सौदान सिंह, बी सतीश और रामलाल की तरह बीजेपी में संघ के नुमाइंदे के तौर पर नए राज्य में नया काम मिलने की संभावनाएं खत्म न हों। प्रदेश में मेनन के जाने के बाद जो परसेप्शन बन रहा है उस पर विराम लगना और लगाना इसलिए जरूरी हो गया है क्योंकि इससे शिवराज और नंदू भी प्रभावित हो रहे हैं। बीजेपी में रहते मेनन के लिए कई विकल्प हैं। ये कहने वाले भी मिल जाएंगे कि उनकी नजर भी कभी प्रदेश अध्यक्ष तो कभी राज्यसभा के साथ संगठन की राष्ट्रीय भूमिका पर भी दूसरे नेताओं की तरह रही है। वह बात और है कि वो शिवराज के साथ बतौर संगठन महामंत्री मिशन 2018 फतेह करने का मानस बना चुके थे। मेनन को जो काम मिला है उसके महत्व को कम नहीं आंका जा सकता क्योंकि सीधेतौर पर उन्हें मोदी सरकार की उन योजनाओं की मॉनिटरिंग का जिम्मा सौंपा गया है जिनके दम पर मोदी दो साल का जश्न मनाने की शुरुआत मध्यप्रदेश से ग्राम उदय से भारत उदय के साथ करने जा रहे हैं जिस पर सीधे पीएमओ की गांव-गांव में नजर होगी। जहां तक बात शिवराज की है तो शिवराज के लिए ये समय जरूर चिंतन और मंथन के साथ नए सिरे से रणनीति बनाने का है कि आखिर मेनन को उनसे दूर ले जाने की वजह क्या है? क्या सिर्फ उनका लंबे समय से संगठन महामंत्री बने रहना है या फिर संघ को मध्यप्रदेश से जो फीडबैक नागौर की प्रतिनिधि सभा में मिला है उसमें अगले चुनाव को लेकर सरकार के सामने कई नई चुनौतियां हैं जिसे मध्यप्रदेश का संगठन गंभीरता से नहीं ले रहा था। शिवराज ने शायद ही कभी संघ की लाइन को चुनौती देने की कोशिश की होगी चाहे फिर वो उनके खुद का सीएम के तौर पर संसदीय बोर्ड की बैठक में चुना जाना और उससे पहले बाबूलाल गौर के चयन के समय अपने दावे को दूर रखना हो। सीएम रहते संघ के एजेंडे को सीधे तौर पर िजन संस्थानों मेें मप्र में लागू किया गया उसमें उन्होंने कभी अपनी पसंद नहीं थोपी और न ही कभी संघ के शीर्ष नेताओं से समन्वय और संवाद कमजोर होने दिया। व्यापमं की बात जरूर अब पुरानी हो चुकी है जिससे संघ की नाराजगी की चर्चा गरम रही है। पिछले करीब दो साल में मोदी के पीएम बनने के बाद लगातार केंद्र से बेहतर तालमेल स्थापित करने के साथ मोदी का प्राथमिकताओं को मप्र में सबसे ज्यादा प्राथमिकता देकर उन्होंने अपने रिश्ते प्रगाढ़ किए हैं ऐसे में सवाल ये खड़ा होता है कि इस मजबूत तिकड़ी से मेनन को दूर कर आखिर संघ और बीजेपी हाईकमान क्या हासिल करना चाहता है। शायद इसके लिए दिल्ली में झंडेवाला के साथ मोदी-शाह तो नागपुर में अगले कुछ दिन की गतिविधियों पर नजर रखनी होगी जिससे कुछ संकेत मप्र को लेकर जरूर मिल सकते हैं।[नया इण्डिया से साभार ]
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