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बिहार चुनाव के मायने
bihar chunav

 

बिहार में अंतिम चरण के मतदान के साथ आज पिछले कुछ दिनों से चल रहीं चुनाव की प्रकिया पूरा हो जायेगी। यह चुनाव कई दृष्टि से महत्वपूर्ण है। जहां यह सुशासन बाबू के भाग्य का फैसला करेगा, वहीं यह राज्य के जाति समीकरणों पर चलने वाली राजनीति के छिपे पहलुओं को भी उजागर करेगा। राज्य के वर्तमान मुख्य मंत्री नीतीश कुमार यद्यपि अपने अब तक के लंबे कार्यकाल के दौरान की उपलब्धियां गिनाने में जुटे हैं परन्तु विपक्षी महागठबंधन, वर्तमान मुख्य की सरकार की असफलताओं - विशेषतया कोराना संकट के दौर में संक्रमित मरीजों की उचित देखभाल और उनके स्वास्थ्य की रक्षा के पर्याप्त उपाय करने में विफल रहने - के साथ राज्य में जनता-जर्नादन के लिये मूलभूत सुविधाओं को जुटाने में असफल होना बता रहे हैं।

 

जैसा कि राज्य चुनावों के पूर्व उदाहरण बताते हैं कि हमारे देश के राज्य एवं स्थानीय चुनावों में यद्यपि स्थानीय मुददों की प्रधानता रहती है लेकिन इस बार देशव्यापी लाकडाउन के दौरान दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता तथा अन्य बड़े नगरों से अपने-अपने घरों को पलायन करने वाले मजदूरों और कामगारों की परेशानियों और काम के अभाव में उनके जीवन में उत्पन्न चुनौतियों का मामला संभवतः विशेष भूमिका निभायेगा। जैसा कि सभी लोग जानते हैं कि इस पलायन में दैनिक रूप से आमदनी करके अपनी जीविका चलाने वाले श्रमिकों को अत्यधिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा, विशेष रूप से जब उन्हें आवागमन के साधनों के बन्द हो जाने के कारण सैकड़ों हजारों मील की दूरी तपती धूप में सपरिवार पैदल चलते हुये पूरी करना पड़ा था। इस यात्रा में कई लोग दुर्घटना के शिकार हुये और कुछ तो यात्रा की परेशानी के कारण अपनी जान से भी हांथ धो बैठे। निश्चय ही ये सभी लोग केंद्र सरकार द्वारा एकाएक लाकडाउन लगाने के फैसले से नाखुश हैं। चूंकि राज्य में नीतीश जी की सरकार केंद्र सरकार के राजनीतिक दल भा0 ज0 प0 के समर्थन से चल रही है तथा इस चुनाव में भी भा0 ज0 प0 के नेतृत्व वाले एन0 डी0 ए0 में भी शामिल है अतः इन मजदूर और कामगार वर्गों का संचित रोष वर्तमान सरकार के विरूद्ध जा सकता है।  

 

इसी के साथ नये युवा मतदाताओं की बढ़ती संख्या इस चुनाव को उनके युवा नजरिये से देखते हुये प्रभावित करने का प्रयास भी करेगी जिसके दायरे में रोजगार, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, साफ पानी, हर साल आने वाली बाढ़ की समस्यायें तथा जनता से किये गये वायदों और लोक लुभावन नारों को तौला एव परखा भी गया होगा। महागठबंधन के प्रमुख नेता तेजस्वी यादव के द्वारा सरकार बनाते ही दस लाख सरकारी नौंकरियां देने का वादा स्वाभाविक रूप से युवाओं को आकर्षित करेगा हालांकि प्रत्युत्तर में एन0 डी0 ए0 का लगभग दूने का वायदा शायद काम कर जाये। तथापि दस लाख नौकरियां कहां से आयेंगी यह एक विचारणीय प्रश्न है। चूंकि आज सूचना क्रांति का युग है और लगभग सभी के हाथ में, विशेष रूप से नवयुवकों एवं नवयुवतियों के पास, मोबाइल है जिसमें सभी जानकारियां उपलब्ध रहतीं हैं। अतः पहले की भांति मतदाताओं को गुमराह करके उनका वोट हासिल करना अब आसान नहीं रह गया है।

इस चुनाव में बिहार के ही दिग्गज नेता रहे स्व0 राम विलास पासवान के पुत्र एवं स्वयं चुनाव प्रत्याशी चिराग पासवान के पक्ष में नये मतदाताओं का स्वाभाविक रूझान कई कारणों से हो सकता है जिनमें उनके पिता की समृद्ध विरासत तथा उनकी हाल में ही हुई मृत्यु से उत्पन्न हमदर्दी की लहर, जातिगत कारण और उनका नया-नवेला युवा नेतृत्व आदि प्रमुख हैं। यद्यपि इस चुनाव के एक्जिट पोल से आ रहे परिणाम भ्रमपूर्ण परिदृश्य पैदा कर रहे हैं तथापि नीतीश जी के विरूद्ध पहले के चुनावों की भांति एंटी इनकमबेंसी फैक्टर अवश्य ही काम करता दिखाई दे रहा है जो महागठबंधन के लिये फायदेमन्द हो सकता है। हालांकि दोनों प्रतिद्वंदियों के बीच कांटे की टक्कर दिखाई दे रही है जिसके कारण त्रिशंकु ऐसेम्बली की संभावना भी हो सकती है। तथापि दोनों पक्षों के अंतर बहुत कम होगा। ऐसी भ्रमात्मक स्थिति में वास्तविक स्थिति तो चुनाव के नतीजे आने पर ही स्पष्ट हो सकेगी।  

प्रो0 सुधांशु त्रिपाठी उ0 प्र0्र राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज, उ0प्र0 10 November 2020

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