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नेताजी सुभाष चंद्र बोसः राष्ट्रप्रेम त्याग एवं आत्मबलिदान का दुर्लभ प्रतीक
  Subhash Chandra Bose

प्रो0 सुधांशु त्रिपाठी  

आचार्य - राजनीति विज्ञान 

उ0 प्र0 राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय

प्रयागराज, उ0प्र0

 

भारत की इस पुण्य भूमि पर अनेक ऐसी विलक्षण विभूतियों ने जन्म लिया है जो अपने त्याग, शौर्य एवं पराक्रम तथा नेतृत्व आदि गुणों के अदभुत संयोग के बल पर देश सेवा, राष्ट्रप्रेम तथा विशाल संगठन निर्माण के अद्वितीय हस्ताक्षर बने। ऐसे महापुरूषों की श्रेणी में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम सदैव अग्रणी रहेगा जिन्होंने अपने युवा जीवन के सुन्दर एवं सुहाने दिनों को पूर्णतया मातृभूमि की आजादी के लिए न्योछावर कर दिया। यद्यपि वे स्कूली शिक्षा के आरम्भिक वर्षों से ही एक अत्यंत मेधावी छात्र थे तथा अपनी प्रतिभा के बल पर उन दिनों इंग्लैण्ड में आयोजित होने वाली भारतीयों के लिए दुर्लभ एवं कठिन आई0 सी0 एस0 की वर्ष 1919 आयोजित परीक्षा में सफलता अर्जित किया - जो किसी भी नवयुवक का एक स्वप्न होता था। परन्तु चयनित होने की इस शानदार उपलब्धि को दरकिनार करते हुये देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति कराना ही उन्होंने अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य निर्धारित किया। 

उन दिनों देश में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में स्वतंत्रता अंादोलन पूरे जोर-शोर से चल रहा था जिसकी मुख्य कमान प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत अगले दशकों में महात्मा गाॅंधी और जवाहर लाल नेहरू के हाथों में थी और उनके प्रभाव के आगे अन्य किसी का स्वतंत्र रूप से खड़े हो पाना अत्यंत दुष्कर था। ऐसे कठिन समय में भी श्री बोस ने केवल कुशल नेतृत्व की न केवल एक मिसाल कायम की बल्कि लगभग 45000 सशस्त्र जवानों की एक शक्तिशाली फौज खड़ी करके राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक सशक्त पैनी धार दी। इसने अंगे्रजी हुकूमत की तोप-टैंक एवं गन पाउडर से लैस अत्याधुनिक सेना को कड़ी चुनौती देते हुये भयभीत किया और कालांतर में देश छोड़ने के लिये विवश भी किया। कई मुददों पर महात्मा गाॅंधी जी से वैचारिक मतभेद के बाद भी वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुये जो आजादी के लक्ष्य के प्रति उनकी पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ ही इस संगठन में उनकी लोकप्रियता का सूचक था। इस पुनीत लक्ष्य की प्राप्ति के लिये देशव्यापी क्रांति के साधन रूपी अस्त्र के प्रति उनका अटूट विश्वास भी उन दिनों भारतीय जनमानस में आशा की उमंग का संचार करने में सहायक हुआ। यह सब देश में उनके नेतृत्व की बढ़ती हुई स्वीकारोक्ति का स्पष्ट परिचायक था। 

स्वतंत्रता प्राप्ति के लक्ष्य के अनुरूप ही उन्होंने 1939 में फारवर्ड ब्लाक नामक राजनीतिक दल की स्थापना की जिसके द्वारा वे पूरी तन्मयता से भारत की आजादी के लिये संपूर्ण देश में जन क्रांति रूपी मशाल जलाना चाहते थे। इसमें क्रंाति की सफलता से प्राप्त देश की आजादी के उपरांत राष्ट्र के पुनर्निर्माण का लक्ष्य भी शामिल था। अपनी इसी प्रतिबद्धता के चलते उन्होंने जनता-जनार्दन को उत्प्रेरित करते हुये नारा दिया कि तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूूंगा या दिल्ली चलो। नेताजी के इन लक्ष्यबेधी नारों ने संपूर्ण जनमानस को न केवल आंदोलित किया बल्कि देशभक्त जनता को अंग्रेजी शासन उखाड़ फेंकने के लिये प्रेरित भी किया। वास्तव में हिंसक क्रंाति के द्वारा जहाॅं वे अंग्रेजी शासन को अपदस्थ करना चाहते थे वहीं आजाद भारत में देशवासियों की अपनी संप्रभु सरकार की स्थापना का स्वप्न भी वे देख रहे थे। इसके अनुक्रम में देश की आजादी के पूर्व ही सर्वप्रथम उन्होंने आजाद हिंद फौज का झंडा फहरा कर अंग्रेजी साम्राज्य को जबर्दस्त झटका दिया और भारतीयों द्वारा देश की स्वतंत्रता को हर हाल में हासिल कर लेने के दृढ़ संकल्प का बिगुल भी बजा दिया। इसे अंगे्रजों के साथ ही संपूर्ण विश्व ने बड़े अचरज के साथ देखा।  

इसीलिये उन्होंने अं्रग्रेजी शासन को दो टूक शब्दों में चुनौती देते हुये कहा कि मैं देश की आजादी याचना से नहीं बल्कि छीन कर लूॅंगा क्योंकि अंग्रेजों की नीयत पर उनका भरोसा उठ गया था और यह विश्वास हो गया था कि गाॅंधी-नेहरू की याचना पर आधारित अहिंसक नीति से देश को आजादी नहीं मिलेगी। अतः श्री बोस ने अंग्रेजांे से लड़ने के लिये कंा्रति का रास्ता चुना तथा एक स्वतंत्र सेना का निर्माण किया जिसमें उन्हें कुछ समर्पित क्रंातिकारियों विशेषतया श्री रास बिहारी बोस एवं श्री मोहन सिंह द्वारा स्थापित सैन्य-संगठन विरासत में मिला। वस्तुतः इन क्रंांितकारियोेेें ने विश्वयुद्ध में कैद हुये भारतीय सैनिकों को आजाद करवा कर देश की स्वाधीनता के लिये एक सशस्त्र सैन्य बल तैयार किया था जिसे नेताजी ने सुसंगठित करके विशाल आकार दिया तथा जिसने अंगे्रजों के लिये एक बड़ी चुनौती खड़ी किया। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण ही अंग्रेजों ने उन्हें कारावास में डाल दिया जहाॅं से वे चुपचाप निकल कर अफगानिस्तान और रूस होते हये जर्मनी आये तथा देश की आजादी के लिये हिटलर कीे नाजी जर्मनी तथा जापान का भी सहयोग लिया जिसमें उन्हें अपेक्षित सफलता भी मिली। द्वितीय विश्वयुद्ध तक आते-आते श्री बोस एक प्रमुख क्रंातिकारी बन चुके थे और यह अंग्रेजी शासन के लिये एक बहुत बड़ी चुनौती थी। अतः वे नेताजी को हर प्रकार से चोट पहुॅंचाकर उनके अस्तित्व को ही समाप्त कर देना चाहते थे। यद्यपि विमान दुर्घटना में हुयी उनकी मृत्यु के रहस्य से पर्दा अभी तक उठ नहीं सका है तथापि एक सुनियोजित षडयंत्र का शिकार बना कर किये गये उनके अंत की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।    

 समग्रतः नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी का संपूर्ण जीवन अप्रतिम शौर्य एवं आत्म बलिदान का एक ऐसा विशिष्ट प्रतीक है जिसका उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है तथा जो निश्चय ही स्व की तिलांजलि और हिसंक क्रांति द्वारा मातृभूमि की आजादी और राष्ट्रनिर्माण तथा देश सेवा का एक स्तुत्य पर्याय बन चुका हैे। यह उनके अनुपम व्यक्तित्व एवं कृतित्व का अद्वितीय और कालजयी उदाहरण प्रस्तुत करता है। निश्चय ही मातृभूमि की सेवा और राष्ट्रप्रेम की दुर्दम्य भावना किसी को भी नेताजी की ओर स्वाभाविक रूप से आकर्षित करता है।   

 

प्रो0 सुधांशु त्रिपाठी उ0 प्र0्र राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज, उ0प्र0 28 January 2021

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