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संसद में पेश FSSAI की वार्षिक रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार, जांचे गए 1.70 लाख खाद्य सैंपलों में 17.6% मानक पर खरे नहीं उतरे। सबसे गंभीर स्थिति डेयरी क्षेत्र की है, जहाँ 38% दूध के सैंपल फेल पाए गए हैं। केंद्र सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' नीति के बावजूद मिलावट रोकने में देश पीछे है और उपभोक्ताओं की सुरक्षा चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।
भारत में मिलावट का प्रमुख कारण उत्पादों की 'लूज बिक्री' है। देश में लगभग 70% दूध और 65% मसाले खुले में बेचे जाते हैं, जबकि अमेरिका में 99% दूध पैकेट में बिकता है, जिससे ट्रैकिंग आसान होती है। इसके साथ ही, प्रशासनिक रिक्तियां और संसाधनों की कमी भी समस्या बढ़ाती हैं—देश में 16% डेजिग्नेटेड ऑफिसर और 35% फूड सेफ्टी ऑफिसर के पद खाली हैं। हर एफएसओ पर औसतन 2,200 फर्में जिम्मेदारी में हैं, जबकि कनाडा में यह संख्या केवल 50 है
दुनिया के अन्य देशों ने मिलावट रोकने के लिए सख्त कदम उठाए हैं। चीन में गंभीर मिलावट पर उम्रकैद या फांसी का प्रावधान है। अमेरिका और कनाडा में खराब उत्पाद मिलने पर 24 घंटे में उसे बाजार से हटाना और माफी देना अनिवार्य है। नॉर्वे और आयरलैंड में तकनीक और ट्रैकिंग से दूध और पशु स्रोत की निगरानी की जाती है, जबकि नीदरलैंड्स में मिट्टी और फसल का डीएनए टेस्ट कर भारी धातु मिलने पर खेती रोक दी जाती है। भारत में सेल्फ-डिक्लेरेशन और लैब की कमी इन वैश्विक मानकों की तुलना में बड़ी चुनौती साबित हो रही है।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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