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सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगा साजिश मामले में जेएनयू के पूर्व छात्र नेताUmar Khalid को जमानत देने से इनकार करने वाले अपने पुराने फैसले पर गंभीर टिप्पणी की है। सोमवार को नार्को-टेररिज्म से जुड़े एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी को बेल मिलना उसका अधिकार है, जबकि जेल अपवाद होना चाहिए। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने कहा कि UAPA मामलों में भी मौलिक अधिकारों का संरक्षण जरूरी है और लंबी हिरासत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 2021 के ‘केए नजीब’ फैसले का हवाला देते हुए माना कि उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज करते समय उस सिद्धांत पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि बड़ी बेंच के फैसलों का पालन छोटी बेंचों को करना चाहिए और उन्हें कमजोर करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। अदालत ने UAPA मामलों में बेहद कम सजा दर का भी उल्लेख किया और कहा कि 2019 से 2023 के बीच ऐसे मामलों में दोषसिद्धि दर सिर्फ 1.5% से 4% रही है।
गौरतलब है किSharjeel Imam समेत कई आरोपी फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में पिछले पांच साल से अधिक समय से जेल में बंद हैं। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए उन्हें एक साल तक नई याचिका दाखिल करने से भी रोक दिया था। उमर खालिद अब तक ट्रायल कोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कुल छह बार जमानत की मांग कर चुके हैं, लेकिन उन्हें अब तक कोई राहत नहीं मिली है।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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