फैसलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाईकोर्ट को 3 महीने की समयसीमा
Supreme Court of India ने देशभर के हाईकोर्ट में लंबित फैसलों और न्याय में देरी पर कड़ा रुख अपनाते हुए बड़ा निर्देश जारी किया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाना अनिवार्य होगा। यदि तय समयसीमा में फैसला नहीं आता है, तो संबंधित हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को मामला चीफ जस्टिस के सामने रखना होगा। अदालत ने खास तौर पर जमानत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में त्वरित आदेश देने पर जोर दिया है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि जमानत याचिकाओं पर आदेश उसी दिन सुनाया और वेबसाइट पर अपलोड किया जाए। यदि फैसला सुरक्षित रखा जाता है, तो अगले दिन तक उसे जारी करना अनिवार्य होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत मिलने के बाद आदेश तुरंत जेल प्रशासन तक पहुंचे, ताकि आरोपी की रिहाई में अनावश्यक देरी न हो। अदालत ने हाईकोर्ट की वेबसाइट पर पारदर्शिता बढ़ाने के लिए यह जानकारी सार्वजनिक करने को कहा कि फैसला कब रिजर्व हुआ, कब सुनाया गया और कब अपलोड किया गया। साथ ही पक्षकारों और वकीलों को ई-मेल के जरिए सूचना देने का भी निर्देश दिया गया है।
यह आदेश झारखंड हाईकोर्ट में 2022 से लंबित एक आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें याचिकाकर्ताओं ने फैसले में देरी को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले न्याय के अधिकार का उल्लंघन बताया था। सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि उन्होंने हाईकोर्ट जज रहते हुए 15 साल में कभी भी फैसला लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के बराबर है और अदालतें अब इस स्थिति को जारी नहीं रहने देंगी।