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धान बोने से पहले मिट्टी की जांच जरूरी, जिंक-सल्फर-बोरॉन की कमी बढ़ा रही किसानों की चिंता
Soil testing , rice sowing, zinc, sulfur, and boron ,deficiencies, farmers concern.

छत्तीसगढ़ में खरीफ सीजन की तैयारियां तेज हो गई हैं और इस वर्ष करीब 29.27 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती का लक्ष्य रखा गया है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी संख्या में किसान बिना मृदा परीक्षण के ही उर्वरकों का उपयोग कर रहे हैं, जिससे खेती की लागत बढ़ रही है और अपेक्षित उत्पादन नहीं मिल पा रहा है। प्रदेश की मिट्टी में जिंक, सल्फर और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी सामने आ रही है, इसलिए धान की बुवाई से पहले मिट्टी की जांच बेहद जरूरी मानी जा रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार मृदा परीक्षण से मिट्टी का पीएच स्तर, जैविक कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश तथा जिंक और सल्फर जैसे पोषक तत्वों की वास्तविक स्थिति का पता चलता है। इसके आधार पर किसानों को संतुलित मात्रा में उर्वरकों के उपयोग की सलाह दी जाती है। कृषि विभाग का मानना है कि बिना जांच के अधिक यूरिया या डीएपी का उपयोग करने से खर्च तो बढ़ता है, लेकिन उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि नहीं होती। सही रिपोर्ट मिलने पर किसान जरूरत के अनुसार खाद का उपयोग कर लागत कम और पैदावार अधिक कर सकते हैं।

 

कृषि वैज्ञानिक किसानों को खेत के 8 से 10 अलग-अलग स्थानों से मिट्टी का नमूना लेकर परीक्षण कराने की सलाह दे रहे हैं। जिंक की कमी दूर करने के लिए जिंक सल्फेट, सल्फर की पूर्ति के लिए सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) और बोरॉन की कमी के लिए बोरेक्स जैसे उर्वरकों का वैज्ञानिक उपयोग करने की सिफारिश की गई है। इसके साथ ही गोबर की सड़ी खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद और फसल अवशेषों को खेत में मिलाने जैसे उपाय मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। धान की बेहतर फसल और कम लागत वाली खेती के लिए मृदा परीक्षण को सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

Priyanshi Chaturvedi 5 June 2026

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