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1857 की क्रांति के दौरान भोपाल रियासत की सैन्य छावनी सीहोर में भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह भड़क उठा था। 6 अगस्त 1857 को रिसालदार वली शाह और कोठ हवलदार महावीर कोठ के नेतृत्व में सैनिकों ने अंग्रेजों का झंडा उतारकर हरा ‘निशाने-मोहम्मदी’ और भगवा ‘महावीरी झंडा’ फहराया। ‘सिपाही बहादुर सरकार’ बनाई गई और महावीर काउंसिल के जरिए प्रशासन चलाया गया। कुछ ही दिनों में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की बैरकों और बंगलों पर कब्जा कर लिया। 22 अगस्त को पॉलिटिकल एजेंट के आवास पर हमला कर जेल से कैदियों को आजाद कराया गया और सरकारी खजाने पर भी कब्जा कर लिया गया। इस दौरान झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने भोपाल की नवाब सिकंदर बेगम को अंग्रेजों का साथ छोड़ने की अपील की, लेकिन बेगम ने अंग्रेजों के प्रति वफादार रहने का फैसला किया।
14 जनवरी 1858 को अंग्रेज जनरल ह्यू रोज की सेना ने सीहोर के सेकंडरी बाग में क्रांतिकारियों को घेर लिया। भीषण गोलीबारी में 356 क्रांतिकारी मारे गए, जिसे भोपाल के इतिहास का सबसे रक्तरंजित सामूहिक हत्याकांड माना जाता है। विद्रोह के प्रमुख नेता वली शाह और महावीर कोठ को गिरफ्तार कर लिया गया और 2 फरवरी 1858 को दोनों को फांसी दे दी गई। इस घटना ने भोपाल और सीहोर में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की उस कहानी को दर्ज किया, जिसमें स्थानीय सैनिकों और क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी थी।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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