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भाग–1 : मातृत्व—सृष्टि का शाश्वत सत्य और भारतीय जीवन-दर्शन का आधार
शैफाली गुप्ता
विश्व मांगल्य सभा द्वारा आयोजित"युगानुकूल मातृत्व"विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी केवल एक वैचारिक आयोजन नहीं थी, बल्कि भारतीय संस्कृति के मूल स्वर—मातृत्व—का पुनर्स्मरण थी। सभागार में देशभर से आए संत, विद्वान, शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, नीति-निर्माता तथा विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिष्ठित हस्तियाँ उपस्थित थीं। मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालकपूजनीय श्री मोहन भागवत जीअपने सहज, संतुलित और गहन चिंतन के साथ उपस्थित थे। पूरा सभागार एकाग्र होकर उनके प्रत्येक शब्द को आत्मसात कर रहा था। उन्हीं श्रोताओं के बीच बैठकर मुझे भी इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
यह कोई सामान्य व्याख्यान नहीं था। यह भारतीय जीवन-दर्शन की उस मूल चेतना का उद्घोष था, जिसने हजारों वर्षों से इस सभ्यता को दिशा दी है। आधुनिकता, तकनीक, बदलते पारिवारिक ढाँचे और वैश्विक चुनौतियों के बीच भागवत जी ने जिस स्पष्टता से मातृत्व की सनातन अवधारणा को प्रस्तुत किया, वह केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है।
उनके उद्बोधन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश था—"मातृत्व चर्चा का विषय नहीं, जीवन का शाश्वत सत्य है।"
आज जब परिवार, विवाह, संस्कार और संबंधों पर निरंतर बहस हो रही है, तब यह वाक्य हमें उस मूल सत्य की ओर लौटाता है जिसे किसी तर्क की आवश्यकता नहीं होती। जैसे सूर्य का प्रकाश सिद्ध करने के लिए प्रमाण नहीं चाहिए, वैसे ही मातृत्व की महिमा किसी बहस की मोहताज नहीं। सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक जीवन की प्रत्येक धारा मातृत्व के माध्यम से ही प्रवाहित हुई है।
भारतीय संस्कृति ने मातृत्व को केवल जैविक प्रक्रिया नहीं माना। यहाँ मातृत्व सृजन है, संरक्षण है, संवर्धन है, करुणा है, त्याग है और सबसे बढ़कर संस्कार है। यही कारण है कि हमारी परंपरा ने केवल जन्म देने वाली स्त्री को ही माता नहीं कहा, बल्कि पृथ्वी कोमातृभूमि, भाषा कोमातृभाषा, गंगा कोगंगा माता, गौ कोगौमाताऔर संपूर्ण प्रकृति कोजगज्जननीका स्वरूप माना। यह दृष्टि बताती है कि जहाँ संरक्षण है, वहाँ मातृत्व है; जहाँ पोषण है, वहाँ मातृत्व है; जहाँ जीवन को आगे बढ़ाने की शक्ति है, वहीं माता का वास्तविक स्वरूप है।
भागवत जी ने कहा कि सृष्टि का निर्माण, संवर्धन और पोषण मातृत्व के बिना संभव नहीं। प्रत्येक जीव की उत्पत्ति माता से होती है। प्रकृति स्वयं मातृत्व की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। वह बिना किसी अपेक्षा के देती है, पोषित करती है और संतुलन बनाए रखती है। यदि मातृत्व न हो, तो केवल जन्म नहीं रुकेगा, बल्कि संवेदनाओं की पूरी परंपरा समाप्त हो जाएगी।
माता : मनुष्य की प्रथम गुरु
मनुष्य और अन्य जीवों में सबसे बड़ा अंतर विचार करने की क्षमता है। पशुओं में जन्म होता है, उनका व्यवहार मुख्यतः प्रकृति द्वारा संचालित होता है, किंतु मनुष्य केवल जन्म से मनुष्य नहीं बनता। उसे संस्कारों की आवश्यकता होती है, शिक्षा की आवश्यकता होती है और जीवन-दृष्टि की आवश्यकता होती है।
यहीं से माता की भूमिका आरंभ होती है।
बालक जब संसार में आता है, तब उसका पहला विद्यालय उसकी माँ की गोद होती है। भाषा का पहला शब्द, स्नेह का पहला अनुभव, अनुशासन का पहला संस्कार, करुणा की पहली अनुभूति और विश्वास का पहला आधार—सब कुछ माता से प्राप्त होता है।
विद्यालय ज्ञान दे सकता है, विश्वविद्यालय कौशल विकसित कर सकता है, किंतु मनुष्य का चरित्र घर में ही बनता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति ने माता को"प्रथम गुरु"कहा है।
माता केवल यह नहीं सिखाती कि कैसे बोलना है; वह यह भी सिखाती है कि कब मौन रहना है। वह केवल चलना नहीं सिखाती; वह यह भी सिखाती है कि किस दिशा में चलना है। वह केवल सफलता की प्रेरणा नहीं देती; वह यह भी सिखाती है कि सफलता से पहले मनुष्यता आवश्यक है।
यही मातृत्व की सबसे बड़ी शक्ति है।
जीवनभर का भावनात्मक आश्रय
भागवत जी का एक अत्यंत मार्मिक विचार था कि मनुष्य को जीवन के प्रत्येक चरण में भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है और वह सबसे अधिक माता के पास मिलता है।
बालक गिरता है तो माँ की गोद में रोता है।
युवक संघर्ष करता है तो सबसे पहले माँ को याद करता है।
जीवन की सफलताएँ हों या असफलताएँ, मन की पीड़ा हो या प्रसन्नता—एक स्थान ऐसा रहता है जहाँ व्यक्ति बिना किसी औपचारिकता के स्वयं को व्यक्त कर सकता है। वह स्थान माँ का हृदय है।
संसार के अनेक संबंध परिस्थितियों के अनुसार बदल जाते हैं। मित्र बदलते हैं, परिचय बदलते हैं, सामाजिक दायरे बदलते हैं, किंतु माँ का स्नेह जीवनभर एक समान रहता है। यही मातृत्व की सबसे बड़ी विशिष्टता है।
समाज का भविष्य मातृत्व पर निर्भर है
आज विज्ञान अभूतपूर्व प्रगति कर रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स, डिजिटल तकनीक और वैश्विक संचार ने दुनिया को बदल दिया है। परंतु एक प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है—आने वाली पीढ़ी को मनुष्य कौन बनाएगा?
तकनीक सुविधा दे सकती है, लेकिन संस्कार नहीं।
मोबाइल सूचना दे सकता है, लेकिन संवेदना नहीं।
विद्यालय शिक्षा दे सकता है, लेकिन चरित्र नहीं।
चरित्र निर्माण की यह प्रक्रिया मातृत्व से प्रारंभ होती है।
यदि माता केवल पालन-पोषण तक सीमित हो जाए और संस्कार का दायित्व समाज किसी संस्था पर छोड़ दे, तो आने वाली पीढ़ी ज्ञानवान तो हो सकती है, किंतु विवेकवान नहीं।
यही कारण है कि भागवत जी ने स्पष्ट कहा कि समाज का भविष्य मातृत्व पर निर्भर करता है। एक संस्कारित माता केवल अपने बच्चे का नहीं, बल्कि आने वाले समाज का निर्माण करती है।
इतिहास इस सत्य का प्रमाण है।
यदि छत्रपति शिवाजी के व्यक्तित्व में राष्ट्रभक्ति और साहस दिखाई देता है तो उसके पीछे माँ जीजाबाई हैं।
यदि स्वामी विवेकानंद विश्ववंदनीय बने तो उसके पीछे उनकी माता भुवनेश्वरी देवी के संस्कार हैं।
यदि महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चले तो उनकी माता पुतलीबाई की धार्मिकता और अनुशासन उसका आधार बने।
महान व्यक्तित्व संयोग से नहीं बनते; उनके पीछे किसी माँ का मौन तप अवश्य होता है।
भारतीय जीवन-दृष्टि : हम सब एक ही चेतना के अंग हैं
अपने उद्बोधन में भागवत जी ने भारतीय दर्शन के मूल सिद्धांत—एकात्मता—को अत्यंत सरल भाषा में प्रस्तुत किया।
भारतीय संस्कृति कहती है कि यह संसार केवल व्यक्तियों का समूह नहीं है। हम सब एक ही चेतना के विविध रूप हैं। बाहर से भले हम अलग दिखाई दें, भीतर से हम एक ही विराट अस्तित्व के अंग हैं।
यही कारण है कि भारतीय चिंतन अधिकार से पहले कर्तव्य की बात करता है।
यदि परिवार में प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने अधिकारों की माँग करेगा, तो परिवार टूट जाएगा।
यदि समाज केवल अधिकारों पर चलेगा, तो संघर्ष बढ़ेगा।
लेकिन यदि प्रत्येक व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाएगा, तो दूसरों के अधिकार स्वतः सुरक्षित हो जाएँगे।
यही भारतीय जीवन-दर्शन का मूल है।
धर्म का अर्थ भी यही है—वह व्यवस्था जो समाज की धारणा करे, जो सबको जोड़कर रखे, जो व्यक्ति को स्वयं से ऊपर उठाकर समष्टि के हित में सोचने की प्रेरणा दे।
इसीलिए भारतीय संस्कृति में मातृत्व केवल निजी संबंध नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। माता अपने परिवार का निर्माण करती है, परिवार समाज का निर्माण करता है और समाज राष्ट्र का निर्माण करता है।
यही वह विचार है जो "युगानुकूल मातृत्व" को केवल महिला विमर्श नहीं रहने देता, बल्कि उसे राष्ट्र निर्माण की आधारशिला बना देता है।
Patrakar Shafali Gupta
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