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छत्तीसगढ़ के कोंडागांव में नारियल की खेती ने बनाई खास पहचान
Coconut cultivation has carved a unique niche in Kondagaon, Chhattisgarh.

 

आमतौर पर नारियल की खेती समुद्र के आसपास के इलाकों के लिए अनुकूल मानी जाती है, लेकिन कोंडागांव का प्रदर्शन सह बीज उत्पादन प्रक्षेत्र इस धारणा से अलग तस्वीर पेश कर रहा है। कृषि मंत्रालय के अधीन नारियल विकास बोर्ड के इस प्रक्षेत्र ने देश के 11 प्रक्षेत्रों में सालाना नारियल उत्पादन के मामले में पहला स्थान हासिल किया है। करीब 100 एकड़ में फैले इस फार्म में लगभग 6 हजार नारियल के पेड़ हैं, जिनसे हर साल 3 लाख से ज्यादा नारियल का उत्पादन होता है।

कोंडागांव स्थित इस प्रक्षेत्र में नारियल की 18 अलग-अलग प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। यहां कुल उत्पादन का करीब 70 फीसदी हिस्सा बौनी, टॉल और संकर किस्मों से प्राप्त होता है। नारियल के उत्पादन के साथ-साथ यहां बड़े स्तर पर पौध तैयार करने का काम भी किया जाता है। हर साल 50 हजार से अधिक नारियल के पौधे तैयार कर किसानों को बेचे जाते हैं और छत्तीसगढ़ के अलावा दूसरे राज्यों से भी इनकी मांग बनी रहती है। पौधों और नारियल की बिक्री से बोर्ड को सालाना करीब एक करोड़ रुपये की आमदनी होती है।

नारियल के पौधे को फल देने में आमतौर पर चार से पांच साल का समय लगता है। इसके बाद अच्छी देखभाल और अनुकूल परिस्थितियों में पेड़ करीब 60 से 70 वर्षों तक उत्पादन देता रह सकता है। हालांकि नारियल की खेती में शुरुआती वर्षों में किसानों को धैर्य रखना पड़ता है, लेकिन लंबे समय तक उत्पादन मिलने के कारण इसे दीर्घकालिक बागवानी के लिए उपयोगी माना जाता है। बेहतर पैदावार के लिए सही प्रजाति का चयन, मिट्टी, सिंचाई, जल निकासी, खाद प्रबंधन और स्थानीय मौसम जैसी बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है।

MadhyaBharat 2 September 2026

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