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गुरु से शिक्षक तक : भारत की शाश्वत ज्ञान-परंपरा
शिक्षक दिवस 2026 – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

गुरु से शिक्षक तक : भारत की शाश्वत ज्ञान-परंपरा

लेखक - शैफाली गुप्ता 

भारत में शिक्षा केवल पुस्तकों में लिखे अक्षरों को पढ़ना नहीं थी। यहाँ शिक्षा का अर्थ था—जीवन को समझना, स्वयं को पहचानना और समाज तथा राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को जानना। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में शिक्षक को केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि ‘गुरु’ कहा गया।

‘गुरु’ शब्द अपने आप में भारतीय ज्ञान-दर्शन की गहराई समेटे हुए है। गुरु वह है जो अज्ञानरूपी अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाए। भारतीय परंपरा में गुरु का स्थान इतना ऊँचा माना गया कि कहा गया—

“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः

गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परब्रह्म

तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”

भारत की पहली पाठशाला—गुरुकुल

जब दुनिया के अनेक हिस्सों में औपचारिक शिक्षा की व्यवस्थित परंपरा विकसित नहीं हुई थी, तब भारत में गुरुकुल व्यवस्था ज्ञान और चरित्र निर्माण का केंद्र हुआ करती थी। विद्यार्थी गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। वहाँ केवल वेद, उपनिषद या शास्त्र ही नहीं पढ़ाए जाते थे, बल्कि व्यवहार, अनुशासन, आत्मसंयम, शस्त्रविद्या, कृषि, आयुर्वेद, राजनीति, दर्शन और जीवन-मूल्यों की भी शिक्षा दी जाती थी।

गुरुकुल में गुरु और शिष्य का संबंध केवल कक्षा तक सीमित नहीं था। गुरु शिष्य के व्यक्तित्व को समझता था और उसकी क्षमता के अनुसार उसका मार्गदर्शन करता था। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक योग्य मनुष्य और जिम्मेदार नागरिक का निर्माण था।

भारत की गुरु-परंपरा कितनी प्राचीन है?

भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु की भूमिका वैदिक काल से दिखाई देती है। ऋषि-मुनियों के आश्रम ज्ञान के केंद्र हुआ करते थे। वेदों का ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुरु से शिष्य तक मौखिक परंपरा के माध्यम से पहुँचा।

महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, संदीपनि, द्रोणाचार्य, याज्ञवल्क्य जैसे गुरु भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में आज भी विद्यमान हैं। श्रीराम और उनके भाइयों ने महर्षि वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की, जबकि श्रीकृष्ण और सुदामा ने महर्षि संदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण की।

यह परंपरा हमें बताती है कि भारत में ज्ञान को व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि समाज की धरोहर माना गया।

गुरु–शिष्य परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता

भारतीय शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता थी—शिक्षा और संस्कार का एक साथ चलना।

गुरु शिष्य को केवल यह नहीं बताता था कि क्या पढ़ना है, बल्कि यह भी सिखाता था कि ज्ञान का उपयोग किस प्रकार करना है।

इसीलिए भारतीय परंपरा में शिक्षा के साथ विनम्रता, सत्य, सेवा, संयम और कर्तव्य को विशेष महत्व दिया गया।

उपनिषदों में गुरु और शिष्य के संवाद इसका सुंदर उदाहरण हैं। नचिकेता और यमराज का संवाद हो या याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी का संवाद—भारतीय शिक्षा परंपरा में प्रश्न पूछने और तर्क करने को भी ज्ञान प्राप्ति का महत्वपूर्ण माध्यम माना गया।

गुरु केवल आश्रमों तक सीमित नहीं थे

भारत की गुरु-परंपरा का विस्तार समय के साथ विश्वविद्यालयों और बड़े ज्ञान-केंद्रों तक हुआ। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे शिक्षा केंद्रों ने भारत को विश्व के प्रमुख ज्ञान-केंद्रों में स्थापित किया।

यहाँ देश-विदेश से विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने आते थे। दर्शन, चिकित्सा, गणित, व्याकरण, राजनीति, खगोल और अनेक विषयों का अध्ययन किया जाता था।

इस परंपरा ने यह सिद्ध किया कि भारत की शिक्षा व्यवस्था केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं थी, बल्कि बहुविषयक और शोधपरक भी थी।

आधुनिक भारत और शिक्षक दिवस

आज हम हर वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाते हैं। यह दिन भारत के महान शिक्षाविद्, दार्शनिक और देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है।

डॉ. राधाकृष्णन का जीवन इस बात का उदाहरण था कि एक शिक्षक केवल कक्षा में पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह समाज की बौद्धिक चेतना को दिशा देने वाला व्यक्ति होता है।

आज शिक्षा का स्वरूप बदल गया है। गुरुकुल की जगह विद्यालय और विश्वविद्यालय हैं, पाठ्यक्रम बदल गए हैं और तकनीक ने शिक्षा के तरीके बदल दिए हैं। लेकिन गुरु की मूल भूमिका आज भी वही है—ज्ञान देना, विवेक जगाना और व्यक्तित्व का निर्माण करना।

आज फिर गुरु की आवश्यकता है

आज का विद्यार्थी सूचना के महासागर में जी रहा है। उसके पास ज्ञान तक पहुँचने के साधन पहले से कहीं अधिक हैं। इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल माध्यमों ने जानकारी प्राप्त करना आसान बना दिया है।

लेकिन जानकारी और ज्ञान में अंतर है, और ज्ञान तथा विवेक में उससे भी बड़ा अंतर।

यहीं शिक्षक की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है।

आज शिक्षक को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला नहीं, बल्कि मार्गदर्शक, प्रेरक और चरित्र-निर्माता बनना होगा।

क्योंकि मशीनें हमें जानकारी दे सकती हैं, लेकिन सही और गलत के बीच अंतर समझाने का काम अभी भी एक संवेदनशील गुरु ही कर सकता है।

गुरु परंपरा से शिक्षक दिवस तक

भारत की हजारों वर्षों की यात्रा में गुरु का स्वरूप बदला है, लेकिन गुरु का महत्व नहीं बदला।

कभी वह वन में स्थित गुरुकुल में शिष्य को जीवन का ज्ञान देता था, आज वह स्मार्ट क्लास में बैठकर नई पीढ़ी को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करता है।

कभी शिक्षा श्रुति और स्मृति से आगे बढ़ती थी, आज वह पुस्तकों और डिजिटल स्क्रीन के माध्यम से आगे बढ़ रही है।

लेकिन दोनों के केंद्र में एक ही भावना है—

“तमसो मा ज्योतिर्गमय।”

अर्थात्—अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।

यही भारतीय गुरु-परंपरा का सार है और यही शिक्षक दिवस का वास्तविक संदेश भी।

एक अच्छा शिक्षक केवल विद्यार्थी का भविष्य नहीं बनाता, वह आने वाले समाज और राष्ट्र का भविष्य गढ़ता है।

इस शिक्षक दिवस पर उन सभी गुरुओं को नमन, जिन्होंने हमें केवल अक्षर नहीं सिखाए, बल्कि जीवन को पढ़ना सिखाया।

गुरु को प्रणाम।

ज्ञान को प्रणाम।

भारत की उस शाश्वत गुरु-परंपरा को प्रणाम, जिसने सदियों से “ज्ञान” को मानवता की सबसे बड़ी शक्ति माना है।

Shafali Gupta 5 September 2026

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