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नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने बुधवार को नई दिल्ली में सहकारी संघवाद और विधिक सुधारों पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ किया।
सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता में एकता है। संविधान केंद्र की शक्ति और राज्यों की स्वायत्तता के बीच संतुलन की रूपरेखा देता है। भारतीय संघवाद की असली ताकत विविधता का सम्मान करते हुए साझा राष्ट्रीय उद्देश्यों के लिए मिलकर काम करने में है।
सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 'टीम इंडिया' की सोच केंद्र और राज्यों के बीच परामर्श, समन्वय और साझा दायित्व पर टिकी है। जनहित के कामों में राजनीतिक मतभेद कभी बाधा नहीं बनने चाहिए।
विकसित भारत @2047 के लक्ष्य पर उन्होंने कहा कि इसके लिए मजबूत कानून, पारदर्शी संस्थाएं, कुशल प्रशासन और सभी के लिए न्याय जरूरी है। पिछले 12 वर्षों में 3 औपनिवेशिक आपराधिक कानूनों को बदलना और 1700 से ज्यादा पुराने कानूनों को निरस्त करना कानूनी व्यवस्था के आधुनिकीकरण की दिशा में अहम कदम है।
उपराष्ट्रपति ने राज्यों के विधि आयोगों से अपील की कि वे पुराने और अप्रासंगिक कानूनों की पहचान कर उन्हें बदलने या हटाने की सिफारिश करें, जिससे आम लोगों का जीवन आसान हो और शासन बेहतर हो।
उन्होंने कहा कि सहकारी संघवाद का मतलब हर चीज में एकरूपता नहीं है। जहां केंद्र और राज्य की जिम्मेदारियां मिलती हैं, वहां साथ काम करना चाहिए, लेकिन राज्यों की विशिष्ट जरूरतों के लिए उनकी स्वतंत्रता भी बनी रहनी चाहिए। उन्होंने विधि आयोगों और विधि विभागों के बीच समन्वय, परामर्श और बेस्ट प्रैक्टिस साझा करने पर जोर दिया।
संसद में लगे सेंगोल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह धर्मसम्मत सत्ता और नैतिक शासन का प्रतीक है। तमिल संत तिरुवल्लुवर की शिक्षाओं का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि सत्ता नहीं, सुशासन ही स्थायी समृद्धि लाता है।
इस दौरान केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, विधि आयोग अध्यक्ष न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी, सदस्य सचिव डॉ. अंजू राठी राणा और प्रो. डी.पी. वर्मा सहित कई गणमान्य उपस्थित रहे।
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