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माता-पिता की सेवा ही ईश्वर की सच्ची भक्तिः पंडित प्रदीप मिश्रा
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सीहोर।  माता-पिता की सेवा करने से ही ईश्वर की सच्ची भक्ति होती है, घर में ही ईश्वर है, फिर भी लोग ईश्वर की भक्ति के लिए दर-दर भटकते रहते है। अगर मानव को ईश्वर की सच्ची भक्ति करनी है तो अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करते हुए उन्हेंने खुश रखे। इस संसार में सभी  बुद्धिमान है, लेकिन बुद्धि की शुद्धि करने की जरूरत है, बुद्ध बनने के पहले हमें शुद्ध होना पड़ेगा। 

 

उक्त विचार जिला मुख्यालय के समीपस्थ चितावलिया हेमा स्थित निर्माणाधीन मुरली मनोहर एवं कुबेरेश्वर महादेव मंदिर में जारी सात दिवसीय शिव महापुराण के छठवें दिन शुक्रवार को प्रसिद्ध कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने कथा का वाचन करते हुए व्यक्त किए। शुक्रवार को कथा सुनने के लिए कुबेरेश्वर धाम में जनसैलाब उमड़ पड़ा। करीब ढाई लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने कथा का श्रवण किया। यहां पर लगाए गए तीन पंडाल में सुबह से श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ था। शनिवार को कथा का समापन किया जाएगा, वहीं रविवार को एक एक दिवसीय गुरु पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन किया जाएगा।

 

 बुजुर्गो, माता-पिता की सेवा में जुटे रहे तो भी परमात्मा की प्राप्ति हो सकती

 

कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि यहां निर्मल चित्त, निस्वार्थ भाव से कि गई हर कामना पूरी होती है। ईश्वर को पाने, मोक्ष पाने की लालसा सभी में रहती है। परमात्मा को पाना है तो जप, तप, भजन, कीर्तन, सत्संग बिना मोह, लालच के करोगे तो परमात्मा जरुर मिलेंगे। जरुरी नहीं कि शिव, राम, कृष्ण भजते रहो। बुजुर्गों, माता-पिता की सेवा में जुटे रहे तो भी परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है। संसार के सभी धर्म माता-पिता के सम्मान की सीख देते हैं। उनकी सेवा ही ईश्वर की सेवा है। जिन्होंने हमें जन्म देकर इस संसार में आने का अवसर दिया और हमारी लालन में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे में माता-पिता का तिरस्कार करना ईश्वर का अपमान है।

 

उन्होंने कहा कि संत पुंडलिक माता-पिता के परम भक्त थे। एक दिन वे अपने माता-पिता के पैर दबा रहे थे कि श्रीकृष्ण वहां प्रकट हो गए। वे पैर दबाने में इतने लीन थे कि अपने इष्टदेव की ओर उनका ध्यान ही नहीं गया। तब प्रभु ने उन्हें स्नेह से पुकार कर कहा, पुंडलिक, हम तुम्हारा आतिथ्य ग्रहण करने आए हैं। पुंडलिक ने जब उस तरफ देखा, तो भगवान के दर्शन हुए। उन्होंने कहा कि मेरे पिताजी शयन कर रहे हैं, इसलिए आप इस ईंट पर खड़े होकर प्रतीक्षा कीजिए और वे पुन: पैर दबाने में लीन हो गए। भगवान पुंडलिक की सेवा और शुद्ध भाव देखकर प्रसन्न हो गए और कमर पर दोनों हाथ धरकर और पैरों को जोड़कर ईंटों पर खड़े हो गए। कुछ देर बाद पुंडलिक ने फिर भगवान से कह दिया कि आप इसी मुद्रा में थोड़ी देर और इंतजार करें। भगवान को पुंडलिक द्वारा दिए गए स्थान से भी बहुत प्रेम हो गया। उनकी कृपा से पुंडलिक को अपने माता-पिता के साथ ही ईश्वर से साक्षात्कार हो गया। ईंट पर खड़े होने के कारण श्री विट्ठल के विग्रह रूप में भगवान आज भी धरती पर विराजमान हैं। यही स्थान पुंडलिकपुर या अपभ्रंश रूप में पंढरपुर कहलाया।

 

आंतरिक रूप से शुद्ध होने के लिए व्यक्ति को सत्संग में आना

 

पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि आंतरिक रूप से शुद्ध होने के लिए व्यक्ति को सत्संग में आना चाहिए और पवित्र उपदेशों का पालन करना चाहिए। इससे वह दुखों, चिंताओं और तनावों से मुक्त हो जाएगा और साथ ही वह ईश्वरीय आनंद पाने के योग्य बन जाएगा। इसलिए दिव्य दृष्टि, शारीरिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य पाने के लिए व्यक्ति को भगवान के वचनों का जाप करना चाहिए।

 

MadhyaBharat 19 July 2024

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