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नई दिल्ली। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में देश का किसान अब केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि सौर ऊर्जा को अपनाकर वास्तविक अर्थों में अन्नदाता भी और ऊर्जादाता भी बनने जा रहा है। बुधवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित तीन दिवसीय 7वें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन सत्र को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री चौहान ने कहा कि खेती और सौर ऊर्जा का संगम विश्व कल्याण और किसानों की आर्थिक समृद्धि का नया मार्ग प्रशस्त कर रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि एग्रीवोल्टाइक नीति ऐसी बननी चाहिए जो देश के 85 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसानों के खेतों पर व्यावहारिक रूप से खरी उतरे।
अन्नदाता भी, ऊर्जादाता भी: खेती और सौर ऊर्जा के तालमेल से बढ़ेगी किसानों की आय
सभागार में देश-विदेश के प्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में पहुंचे किसानों का स्वागत करते हुए कृषि मंत्री चौहान ने कहा कि एग्रीवोल्टाइक तकनीक से एक ही जमीन पर ऊपर सौर पैनल से बिजली पैदा होगी और नीचे फसल लहलहाएगी। उन्होंने इसे सरल देसी अंदाज में समझाते हुए कहा कि यह आम के आम और गुठलियों के दाम तथा हिंग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा जैसा सशक्त मॉडल है। उन्होंने कहा कि पुराने समय में कहा जाता था रहिमन पानी राखिये, लेकिन आज के युग में स्थिति ऐसी है कि रहिमन बिजली राखिये, क्योंकि आधुनिक जीवन और खेती में बिना बिजली सब शून्य है, इसलिए खेती के साथ-साथ ऊर्जा उत्पादन को जोड़ना किसानों के हित में सबसे बड़ा कदम है।
85 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसानों के हित को केंद्र में रखकर बने एग्रीवोल्टाइक नीति
केंद्रीय कृषि मंत्री चौहान ने गर्व के साथ रेखांकित किया कि एक दौर था जब भारत खाद्य सुरक्षा के लिए खाद्यान्न आयात पर निर्भर था, लेकिन आज देश के अन्नदाताओं के पसीने की बदौलत अन्न भंडार गेहूं और धान से पूरी तरह लबालब भरे हुए हैं। भारतीय कृषि क्षेत्र लगातार 4.5 प्रतिशत की मजबूत विकास दर बनाए हुए है, जो अपने आप में एक बड़ा कीर्तिमान है। कृषि उत्पादों का निर्यात 52.55 अरब डॉलर के नए रिकॉर्ड पर पहुंच चुका है और हाल ही में रबी सीजन 2026-27 की बुवाई भी शुरू हो चुकी है, जिसमें दलहन और तिलहन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
चौहान ने वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के समक्ष जमीनी हकीकत रखते हुए स्पष्ट किया कि भारत में औसत भूमि जोत मात्र 0.96 हेक्टेयर है और 85 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे व सीमांत हैं, जिनके पास इतनी जमीन नहीं है कि वे खेती छोड़कर केवल सोलर प्लांट लगा सकें। उन्होंने जोर दिया कि प्रयोगशालाओं और सरकारी संस्थानों में तो पैसा लग जाता है, लेकिन किसान को अपनी गाढ़ी कमाई लगानी पड़ती है, इसलिए मॉडल ऐसा होना चाहिए जो छोटे किसान के खेत में व्यावहारिक रूप से सफल हो और कृषि उत्पादन किसी भी कीमत पर न रुके। उन्होंने कहा कि केवल सोलर पैनल के नीचे कुछ पौधे लगा देने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा, बल्कि पैनल की ऊंचाई, खंभों के बीच की दूरी और जुताई की व्यवस्था ऐसी रखनी होगी ताकि किसान हर साल अपनी पसंद से फसल और फसल-चक्र बदल सके।
कृषि और ऊर्जा मंत्रालय कदम से कदम मिलाकर करेंगे काम
चौहान ने व्यावहारिक चुनौतियों के समय रहते समाधान पर बल देते हुए कहा कि पैनलों से गिरने वाले वर्षा जल के सुरक्षित निकास और संचयन का पुख्ता प्रबंध हो ताकि खेतों में मिट्टी का कटाव न हो और पानी की एक-एक बूंद का सदुपयोग हो सके। उन्होंने बिजली खरीद, ग्रिड तक पहुंच और किसानों को समय पर पारदर्शी भुगतान की पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित करने की बात कही। साथ ही सुझाव दिया कि किसान उत्पादक संगठनों को इसमें सक्रिय रूप से जोड़ा जाए और उपकरणों के संचालन, मरम्मत व रखरखाव का प्रशिक्षण स्थानीय ग्रामीण युवाओं व महिलाओं को दिया जाए ताकि गांवों में ही रोजगार के बड़े अवसर तैयार हों। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई कंपनी परियोजना बीच में छोड़ दे या अनुबंध समाप्त होने पर पैनल हटाने पड़ें, तो उसका कोई भी वित्तीय या भौतिक बोझ किसान पर न आए, इसकी जिम्मेदारी शुरुआत में ही तय होनी चाहिए।
गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता 308 गीगावाट पार, एग्रीवोल्टाइक से 2050 की बिजली मांग होगी पूरी
इस अवसर पर केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि यह 7वां संस्करण अब तक आयोजित सभी छह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की तुलना में सबसे बड़ा और ऐतिहासिक है, जिसमें रिकॉर्ड भागीदारी के चलते अतिरिक्त हॉल की व्यवस्था करनी पड़ी। उन्होंने कहा कि जब पूरी दुनिया आर्थिक संकटों से जूझ रही है, तब भारत चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की जीडीपी विकास दर के साथ विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना हुआ है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2014 से पहले देश की कुल बिजली क्षमता लगभग 249 गीगावाट थी, जो आज बढ़कर 560 गीगावाट से अधिक हो चुकी है। इसमें गैर-जीवाश्म स्थापित क्षमता 308 गीगावाट पार कर चुकी है, जिसमें से 100 गीगावाट क्षमता पिछले मात्र ढाई वर्षों में जोड़ी गई है। साथ ही वर्ष 2012-13 में 11 रुपये प्रति यूनिट रहने वाली गैर-जीवाश्म बिजली की लागत आज बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण घटकर मात्र 2.60 रुपये प्रति यूनिट रह गई है।
जोशी ने टेरी के अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि देश की 11.6 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से 4.75 करोड़ हेक्टेयर भूमि लगभग 30 प्रतिशत एग्रीवोल्टाइक के लिए तकनीकी रूप से पूरी तरह उपयुक्त है, जिसमें महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी है। उन्होंने रेखांकित किया कि यदि इस उपयुक्त भूमि के मात्र 10 प्रतिशत हिस्से पर भी एग्रीवोल्टाइक लगा दिया जाए, तो भारत वर्ष 2050 तक की अपनी पूरी अनुमानित बिजली मांग को अकेले इसी से पूरा कर सकता है, साथ ही इससे फसलों की पैदावार में भी 10 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी गई है।
पीएम कुसुम के अगले चरण में शुरू होगा दुनिया का सबसे बड़ा एग्रीवोल्टाइक अभियान
जोशी ने बताया कि पीएम कुसुम योजना के तहत अब तक 30 लाख कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ा जा चुका है, जिससे किसानों को रात के जोखिम भरे समय में सिंचाई से मुक्ति मिली है और दिन में निर्बाध बिजली मिल रही है। उन्होंने घोषणा की कि सरकार जल्द ही पीएम कुसुम के अगले चरण के तहत दुनिया का सबसे महत्वाकांक्षी एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम शुरू करने जा रही है। उन्होंने कहा कि अध्ययनों के अनुसार इस क्षेत्र में लगभग 3.32 लाख पूर्णकालिक स्थानीय रोजगार पैदा होंगे, जिससे ग्रामीण युवाओं को रोजगार की तलाश में जिला मुख्यालयों या बड़े शहरों की ओर पलायन नहीं करना पड़ेगा।
उद्घाटन समारोह के मंच पर केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपाद येसो नाईक, भारत एवं भूटान में जर्मनी के राजदूत डॉ. जैस्पर विक, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव अतीश चंद्रा, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव तथा आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. मांगी लाल जाट और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन के महानिदेशक आशीष खन्ना विशेष रूप से उपस्थित रहे।
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