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पंचायतों को स्थानीय विवादों में मध्यस्थता के लिए कानूनी रूप से सशक्त बनाना जरूरी : राष्ट्रपति
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नई दिल्ली । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने शनिवार को नई दिल्ली में प्रथम राष्ट्रीय मध्यस्थता सम्मेलन में कहा कि पंचायतों को गांवों में विवादों में मध्यस्थता करने और उन्हें सुलझाने के लिए कानूनी रूप से सशक्त बनाया जाना चाहिए।

राष्ट्रपति ने कहा कि मध्यस्थता अधिनियम, 2023 सभ्यतागत विरासत को मजबूत करने की दिशा में पहला कदम है। अब हमें इसमें गति लाने और इसके अभ्यास को मजबूत करने की आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मध्यस्थता अधिनियम के तहत विवाद समाधान तंत्र को ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभावी रूप से विस्तारित किया जाना चाहिए ताकि पंचायतों को गांवों में विवादों को सुलझाने और मध्यस्थता करने के लिए कानूनी रूप से सशक्त बनाया जा सके। गांवों में सामाजिक सद्भाव राष्ट्र को मजबूत बनाने की एक अनिवार्य शर्त है। उल्लेखनीय है कि मध्यस्थता अधिनियम 2023 के तहत ऐसे सिविल और व्यावसायिक विवादों का समाधान किया जा सकता है जिन्हें आपसी सहमति से हल किया जा सकता है।

राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में ग्रामीण स्तर पर विवाद समाधान की प्रणाली को सशक्त बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने विशेष रूप से मध्यस्थता व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि गांवों में छोटे-छोटे विवादों को पंचायत स्तर पर सुलझाने की परंपरा रही है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में उनके पास कानूनी अधिकार नहीं होने के कारण उनका निर्णय प्रभावी नहीं हो पाता। उन्होंने सुझाव दिया कि पंचायतों को कानूनी रूप से सशक्त किया जाना चाहिए। इससे न केवल गांवों में शांति और सद्भाव बना रहेगा, बल्कि न्यायालयों पर बढ़ते बोझ को भी कम किया जा सकेगा।
राष्ट्रपति ने कहा कि न्याय दिलाने में मध्यस्थता की अहम भूमिका होती है। विवादों को सुलझाने में पंचायतों की अहम भूमिका रही है। भारत एक जीवंत लोकतंत्र है जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका- इन तीन स्तंभों पर टिका है। संविधान ने गांव से लेकर संसद तक एक सुगठित तंत्र की नींव रखी है, लेकिन गांवों में न्यायिक व्यवस्था अभी भी सशक्त नहीं बन पाई है। इस संदर्भ में उन्होंने मध्यस्थता अधिनियम 2023 और भारतीय मध्यस्थता परिषद की स्थापना का उल्लेख किया। उल्लेखनीय है कि मध्यस्थता अधिनियम 2023 के तहत ऐसे सिविल और व्यावसायिक विवादों का समाधान किया जा सकता है जिन्हें आपसी सहमति से हल किया जा सकता है।


राष्ट्रपति का मानना है कि गांवों में रहने वाले लोग सामान्यतः शांति और भाईचारे के साथ रहना पसंद करते हैं। पारंपरिक रूप से भूमि और पारिवारिक सहित अन्य विवादों को पंचायतों के माध्यम से हल किया जाता रहा है, लेकिन आज के समय में, जब लोग अधिक जागरूक और शिक्षित हो गए हैं, वे उन फैसलों को नहीं मानते क्योंकि स्थानीय मध्यस्थों के पास कोई वैधानिक अधिकार नहीं होता। ऐसे में ग्रामीण कोर्ट का रूख करते हैं और फिर वे सब-डिवीजन कोर्ट, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट, हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक चले जाते हैं।

 

राष्ट्रपति ने कहा कि गांवों के वे लोग जो समाज की बुनियादी संरचना और समस्याओं को समझते हैं, उन्हें इस तंत्र में शामिल किया जाए, भले ही वे बहुत अधिक पढ़े-लिखे न हों। इससे न्याय व्यवस्था और समाज दोनों को सुदृढ़ बनाने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि भारत में पंचायत की संस्था सौहार्दपूर्ण समाधान को बढ़ावा देने के लिए प्रसिद्ध है। पंचायत का प्रयास न केवल विवाद को हल करना था, बल्कि इसके बारे में पक्षों के बीच किसी भी कड़वाहट को दूर करना भी था। दुर्भाग्य से औपनिवेशिक शासकों ने इस अनुकरणीय विरासत को नजरअंदाज कर दिया जब उन्होंने हम पर एक विदेशी कानूनी प्रणाली थोपी। मध्यस्थता अधिनियम, 2023 उस खामी को दूर करता है और इसमें कई प्रावधान हैं जो भारत में एक जीवंत और प्रभावी मध्यस्थता पारिस्थितिकी तंत्र की नींव रखेंगे।

MadhyaBharat 3 May 2025

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