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मैक्लोडगंज के चुगलाखंग बौद्ध मठ में हुआ भव्य समारोह का आयोजन
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धर्मशाला । तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा रविवार को 90 साल के हो गए। धर्मगुरु के जन्मदिवस पर मिनी ल्हासा के नाम से विख्यात मैक्लोडगंज के मुख्य बौद्ध मठ चुगलाखंग में भव्य समारोह का आयोजन हुआ। इस मौके पर दलाई लामा ने केक भी काटा और समारोह में मौजूद अनुयायियों के प्रति अपना आभार जताया। इस दौरान कई प्रमुख हस्तियों सहित सैकड़ों की संख्या में तिब्बती समुदाय और अन्य अनुयायी मौजूद रहे। इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू, केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन, अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू, सिक्किम के धार्मिक मंत्री सोनम, हॉलीवुड अभिनेता रिचर्ड गेरे, आदि मौजूद रहे।


प्रधानमंत्री मोदी ने भी दी जन्मदिन की शुभकामनाएं


उधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी दलाई लामा को शुभकामनाएं देते हुए उनके अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा-1.4 अरब भारतीयों की ओर से मैं परम पूज्य दलाई लामा को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं। वह प्रेम, करुणा, धैर्य और नैतिक अनुशासन का प्रतीक हैं।

 

अमेरिका के तीन पूर्व राष्ट्रपतियों ने भी दी बधाई


इसके अलावा समारोह के दौरान अमेरिका के 3 पूर्व राष्ट्रपतियों, बराक ओबामा, बिल क्लिंटन और जॉर्ज बुश का वीडियो संदेश भी चलाया गया, जिसमें वे दलाई लामा को शांति का प्रतीक बताते नजर आए। उन्होंने दलाई लामा को जन्मदिन की शुभकामनाएं भी दीं।


बचपन में ही पहचान ली गई थी दलाई लामा की महानता


दलाई लामा का असली नाम ल्हामो धोन्डुप था, जिन्हें बाद में तेंजिन ग्यात्सो नाम से जाना गया। उनका जन्म 6 जुलाई 1935 को तिब्बत के ताक्सर गांव (अमदो क्षेत्र) में हुआ। केवल दो वर्ष की आयु में ही उन्हें 14वें दलाई लामा के पुनर्जन्म के रूप में पहचाना गया। 1939 में उन्हें तिब्बत की राजधानी ल्हासा लाया गया और 22 फरवरी 1940 को पारंपरिक, धार्मिक और राजनीतिक अनुष्ठानों के साथ उन्हें तिब्बत का सर्वोच्च नेता घोषित किया गया। मात्र 6 साल की उम्र में उन्होंने बौद्ध दर्शन, तंत्र, संस्कृत, तर्क और अन्य शास्त्रों की पढ़ाई शुरू कर दी थी।


1959 से भारत में निर्वासन में रह रहे दलाई लामा विश्व को दे रहे हैं शांति का संदेश


1950 में जब चीन ने तिब्बत पर हमला किया, तब महज 15 वर्ष की आयु में दलाई लामा को राजनीतिक जिम्मेदारी उठानी पड़ी। इसके बाद मार्च 1959 में तिब्बत में राष्ट्रीय विद्रोह को जब बेरहमी से दबा दिया गया, तो दलाई लामा को 80 हजार से अधिक तिब्बती शरणार्थियों के साथ भारत आना पड़ा। भारत सरकार ने उन्हें धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में शरण दी, जहां से उन्होंने तिब्बती निर्वासित सरकार की स्थापना की। तब से लेकर आज तक दलाई लामा भारत को अपना आध्यात्मिक और सांस्कृतिक घर मानते हुए यहीं निवास कर रहे हैं। वह शांति, करुणा, सहिष्णुता और सार्वभौमिक मानवता का संदेश पूरी दुनिया में फैला रहे हैं।


1989 में मिला था नोबेल शांति पुरस्कार

 

दलाई लामा को दुनियाभर में शांति, अहिंसा और धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। साल 1989 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने दुनिया भर के कई देशों में यात्राएं कर लोगों को करुणा, संवाद और आंतरिक शांति के महत्व को समझाया है। वर्तमान में वह वैश्विक मंचों पर प्राचीन भारतीय ज्ञान- विशेषकर बुद्ध धर्म, योग, ध्यान और मन की प्रकृति की शिक्षा देकर मनोविज्ञान और भावनात्मक संतुलन को लेकर नई दिशा दे रहे हैं।


भारत को मानते हैं अपना गुरु


दलाई लामा ने कई बार कहा है कि वह भारत को न केवल अपनी शरणस्थली, बल्कि "गुरु का देश" मानते हैं। उनका कहना है कि मैं चेला हूं और भारत देश मेरा गुरु है।

 

 

MadhyaBharat 6 July 2025

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