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प्रधानमंत्री ने गंगईकोंडा चोलपुरम स्थित बृहदेश्वर मंदिर में की पूजा-अर्चना
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गंगईकोंडा चोलपुरम । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तमिलनाडु की अपनी आधिकारिक यात्रा के दूसरे और अंतिम दिन रविवार को अरियालुर जिले में यूनेस्को धरोहर स्थल गंगईकोंडा चोलपुरम स्थित बृहदेश्वर मंदिर पहुंचे। उन्होंने मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की और देशवासियों के लिए सुख-शांति की कामना की।

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी त्रिची हवाई अड्डे से हेलीकॉप्टर द्वारा गंगईकोंडा चोलपुरम पहुंचे। यहां मंदिर के पास ही अस्थायी हेलीपैड बनाया गया था। यहां आने के बाद प्रधानमंत्री ने गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की। उन्होंने देश तथा देशवासियों के लिए सुख-शांति की कामना की। प्रधानमंत्री ने पूरे मंदिर परिसर का दौरा किया। 
 
प्रधानमंत्री ने कहा कि भगवान बृहदेश्वर के चरणों में पूजा करने का सौभाग्य मुझे मिला। मैंने 140 करोड़ देशवासियों की भलाई और भारत की निरंतर प्रगति के लिए प्रार्थना की है। मेरी कामना है कि सभी को भगवान शिव का आशीर्वाद मिले।
 
प्रधानमंत्री का मंदिर के पुजारियों ने पारंपरिक तरीके से ‘पूर्ण कुंभम’ के साथ स्वागत किया। वेष्टि (धोती), सफेद कमीज और गले में अंगवस्त्र पहने प्रधानमंत्री ने मंदिर के भीतरी गलियारे की परिक्रमा की।
 
प्रधानमंत्री की उपस्थिति में ओधुवर द्वारा पवित्र भजनों (थेवरम) का पाठ और प्रसिद्ध संगीतकार इलैयाराजा द्वारा एक आध्यात्मिक संगीत कार्यक्रम सहित कई कार्यक्रम आयोजित किए गए।
 
प्रधानमंत्री ने यहां राजेंद्र चोल प्रथम की स्मृति में एक स्मारक सिक्का जारी किया, साथ ही उन्होंने थेवरम गीतों की एक पुस्तिका का विमोचन भी किया।

केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित मंदिर कार्यक्रम में भाग लेने से पहले, प्रधानमंत्री मोदी ने त्रिची शहर में एक रोड शो भी किया। उन्होंने एक निजी होटल से त्रिची हवाई अड्डे तक लगभग 8 किलोमीटर की दूरी तय की। रास्ते में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री का गर्मजोशी से स्वागत किया।

 

 

प्रधानमंत्री ने अपने दौरे के दूसरे दिन चोल सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम की जयंती में भाग लिया, जिन्होंने 1,000 साल पहले गंगा और दक्षिण पूर्व एशिया, आधुनिक (केडा) मलेशिया में एक सैन्य समुद्री अभियान चलाया था, जिसके कारण उन्हें गंगईकोंडान और केदारंकोंडन की उपाधियां मिलीं।

 

उल्लेखनीय है कि यह उत्सव राजेंद्र चोल की दक्षिण पूर्व एशिया की समुद्री यात्रा के 1,000 वर्ष पूरे होने तथा गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर के निर्माण की शुरुआत की भी याद में आयोजित किया गया। यह मंदिर चोल वास्तुकला का एक शानदार उदाहरण माना जाता है। आदि तिरुवथिरई महोत्सव 23 जुलाई को शुरू हुआ था और 27 जुलाई यानी आज रविवार को इसका समापन हो रहा है। 

MadhyaBharat 27 July 2025

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