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मप्र के पांढुर्ना में परंपरागत गोटमार मेला शुरू
bhopal, Traditional Gotmar fair ,Pandhurna of MP
भोपाल । मध्य प्रदेश के पांढुर्ना जिले में हर साल की तरह इस बार भी खतरनाक परम्परागत खेल शुरू हो गया है। यहां दो गांवों पांढुर्ना और सावरगांव के बीच जाम नदी पर शनिवार को गोटमार मेले की शुरुआत हो चुकी है। दोनों गांवों के लोग एक-दूसरे पर पत्थरों की बौछार कर रहे हैं। मौके पर 600 पुलिस जवान, 45 डॉक्टर और 200 मेडिकल स्टाफ तैनात है। कलेक्टर अजय देव शर्मा ने बीएनएस की धारा 163 भी लागू कर दी है।
 
दरअसल, पांढुर्ना में गोटमार मेला हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में पोला त्योहार के दूसरे दिन होता है। इस दौरान पांढुर्ना और सावरगांव के बीच बहने वाली जाम नदी के दोनों किनारों से दोनों गांव के लोग एक-दूसरे पर पत्थर बरसाकर इस परंपरा को निभाते हैं। आज शनिवार को सुबह 10 बजे पांढुर्ना और सावरगांव के लोगों ने जाम नदी के बीच में लगे झंडे और आराध्य देवी चंडी माता का पूजन किया। इसके बाद गोटमार मेले की शुरुआत हुई। फिलहाल दोनों गांवों के लोग एक दूरे पर पत्थर बरसा रहे हैं।
 
पांढुर्ना कलेक्टर अजय देव शर्मा ने बताया कि गोटमार मेले को लेकर सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। चार जिलों का 600 से अधिक पुलिस बल तैनात किया गया है। अस्थाई अस्पताल भी बनाए गए हैं। परंपरा रीति रिवाज के अनुसार शांतिपूर्ण से तरीके से हो और गोटमार मेले में किसी प्रकार की परेशानी न हो, इसके लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं।
 
पांढुर्ना में गोटमार मेले की परंपरा करीब 300 साल बहुत पुरानी बताई जाती है। यह मेला कब शुरू हुआ, इसका किसी को ठीक से अंदाजा नहीं है, लेकिन इसे मनाने की परंपरा के पीछे कई किवदंतियां हैं। जिसमें प्रेमी-युगल के प्रसंग और भोंसला राजा के सैनिकों के युद्धभ्यास की कहानी को मेले की शुरुआत से जोड़ा जाता है। एक किवदंती के अनुसार पांढुर्ना के एक लड़के का दिल सावरगांव की एक लड़की पर आ गया और फिर दोनों के बीच इश्क परवान चढ़ने लगा। दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया। एक दिन पांढुर्ना का लड़का अपने दोस्तों के साथ सावरगांव पहुंचा और अपनी प्रेमिका को भगाकर ले जा रहा था। जब दोनों जाम नदी को पार कर रहे थे, तभी सावरगांव के लोग वहां पहुंच गए और फिर प्रेमी युगल पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। इसके विरोध में पांढुर्ना के लोगों ने भी पत्थरबाजी की।
 
देखते ही देखते पांढुर्ना और सावरगांव के बीच बहती नदी के दोनों किनारों से बदले के पत्थर बरसाने लगे। जिसमें नदी के बीच ही लड़का और लड़की की मौत हो गई। दोनों की मौत के बाद पांढुर्ना और सावरगांव के लोगों को अपनी गलती का अहसास हुआ। लिहाजा दोनों गांव के लोगों ने प्रेमी-प्रेमिका का शव ले जाकर मां चंडी के मंदिर में रखा और पूजा-पाठ के बाद उनका अंतिम संस्कार कर दिया। इसके बाद से ही परंपरा के नाम पर यह खूनी खेल शुरू हो गया, जो अब तक चल रहा है।
 
इस खेल में प्रेमी युगल के प्रतीक स्वरूप नदी के बीच पुल के पास एक पलाश का पेड़ गाड़ा जाता है और उस पर झंडी बांधी जाती है। इसी पेड़ की झंडी को तोड़ने के लिए दोनों पक्षों के बीच खूनी गोटमार खेला जाता है। जो पक्ष पहले झंडी को तोड़ता है, उसकी जीत होती है। उस झंडी को आराध्य देवी मां चंडिका के मंदिर में चढ़ाया जाता है और इसी के साथ गोटमार मेले का समापन होता है। वहीं दूसरी कहानी प्रचलित है कि जाम नदी के किनारे पांढुर्ना-सावरगांव वाले क्षेत्र में भोंसला राजा की सेना रहती थी। युद्धाभ्यास के लिए सैनिक नदी के बीचोंबीच एक झंडा लगाकर पत्थरबाजी का मुकाबला करते थे। युद्धाभ्यास लंबे समय तक चलता रहा। जिसके बाद यह गोटमार मेले की परंपरा बन गई।
 
गोटमार मेले पर रोक लगाने के लिए मानव आयोग, उच्च न्यायालय के आदेश के परिपालन में जिला प्रशासन वर्षों से प्रयास कर रहा है, लेकिन सभी नाकाम साबित हुए। वर्ष 2009 में मानवाधिकार आयोग ने गोटमार में होने वाली पत्थरबाजी पर रोक लगाने की कोशिश की। तत्कालीन कलेक्टर निकुंज श्रीवास्तव व एसपी मनमीत सिंह नारंग ने पुलिस फोर्स तैनात कर पत्थरबाजी बंद कराते हुए मेले के मुख्य झंडे को चंडी माता मंदिर में ला दिया, जिससे लोगों में आक्रोश पनप गया। इससे कई जगह तोड़फोड़ की स्थिति बनी। प्रशासन से नाराज लोगों ने खेलस्थल पर पहुंचकर पत्थरबाजी की।
 
घायलों की संख्या कम करने का प्रयास करते हुए साल 2001 में रबर गेंद से खेल खेलने का आग्रह किया। खेलस्थल से पत्थर हटाकर रबर गेंद बिछा दी गई। शुरुआत में खिलाड़ियों ने एक-दूसरे पर रबर गेंद बरसाई, लेकिन दोपहर के बाद मेला अपने चरम पर पहुंच गया और खिलाड़ियों ने नदी से पत्थर खोदकर एक-दूसरे पर बरसाने शुरू कर दिए। वहीं वर्ष 1978 व 1987 में खेलस्थल से खिलाड़ियों को हटाने के लिए प्रशासन को आंसू गैस और गोली चलानी पड़ी थी।
 
अब तक 14 लोगों की हो चुकी है मौत
इस गोटमार मेले में अब तक 14 लोगों की मौत हो चुकी है। वर्ष 1955 में महादेव सांबारे, 1978 में देवराव सकरडे, 1979 में लक्ष्मण तायवाड़े, 1987 में कोठीराम सांबारे, 1989 में विठ्ठल तायवाड़े, योगीराज चौरे, गोपाल चल्ने व सुधाकर हापसे, 2004 में रवि गायकी, 2005 जनार्दन सांबारे, 2008 में गजानन घुघुसकर और 2011 में देवानंद वधाले ने गोटमार में जान गंवाई है। इसमें महादेव सांबारे, कोठीराम सांबारे व जनार्दन सांबारे एक ही परिवार के हैं। जाटबा वार्ड की गिरजाबाई घुघुसकर के बेटे गजानन की साल 2008 में गोटमार में मौत हुई।
MadhyaBharat 23 August 2025

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