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नेशनल हेराल्ड मामले में सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई हुई, जिसमें मामले की जटिलताओं और ईडी (एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट) की जांच की सीमाओं पर जोर दिया गया। सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल (एसजी) ने बताया कि एक निजी व्यक्ति ने सक्षम कोर्ट में शिकायत दर्ज करवाई थी, जिसे कोर्ट ने संज्ञान में लिया। इस संज्ञान लेने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने सुनवाई करने से इनकार किया लेकिन संज्ञान लेने के आदेश को सही ठहराया। एसजी ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट द्वारा लिया गया संज्ञान आईपीसी की धारा 420 के तहत अपराध के अंतर्गत आता है और यह केवल एक निजी शिकायत पर आधारित था, जिसे ट्रायल कोर्ट ने गंभीरता से देखा।एसजी ने यह भी कहा कि इस मामले का महत्व सिर्फ इस घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव से कई अन्य मामलों पर असर पड़ेगा। कोर्ट ने एसजी से पूछा कि क्या पहले भी कोई मामला ऐसा हुआ है, जिसमें निजी शिकायत और कोर्ट द्वारा संज्ञान लेने के आधार पर ईडी ने केस शुरू किया हो। एसजी ने जवाब दिया कि प्रीवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट में अपराध पंजीकरण का तरीका स्पष्ट नहीं है और प्राथमिकी या शिकायत का होना जरूरी है। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने जो निर्णय लिया, उसका सार यह है कि सिर्फ प्राथमिकी के आधार पर ही ईडी जांच शुरू कर सकती है, भले ही कोर्ट ने संज्ञान लेकर गवाहों की जांच की हो और प्रथम दृष्टया मामला बनता हो। इस सुनवाई से यह स्पष्ट हुआ कि निजी शिकायत और कोर्ट के संज्ञान का मामला ईडी की जांच के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
Patrakar Vandana singh
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