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भोपाल। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश की लगभग 21 प्रतिशत जनसंख्या जनजातीय समुदाय से संबंधित है। राज्य सरकार इनके समग्र कल्याण के लिए हर स्तर पर प्रयास कर रही है। इसी क्रम में जनजातीय वर्गों की वनों पर केन्द्रित जीवन संस्कृति और इनकी पारम्परिक ज्ञान-सम्पदा को संरक्षित करना भी सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि वन, औषधीय पौधों, खेती-किसानी और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा वृहद पारम्परिक ज्ञान लंबे समय से समुदाय के अनुभवी बुजुर्गों और पारम्परिक ज्ञानधारकों के जरिए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहा है। यद्यपि इस ज्ञान को व्यवस्थित रूप से अभिलेखबद्ध करना एक बड़ी चुनौती है, तथापि राज्य सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि सरकार ने जनजातीय समुदाय के देशी ज्ञानधारक बुजुर्गों और वरिष्ठ जानकारों के सहयोग से पारम्परिक ज्ञान-सम्पदा के दस्तावेजीकरण का लक्ष्य तय किया है। इसके लिए जनजातीय अनुसंधान एवं विकास संस्था (टीआरआई-भोपाल) को यह अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है। सरकार की इस पहल के अंतर्गत जनजातीय समुदाय के परम्परागत वनवासी वैद्य, तड़वी, भुमका, बरवा, ओझा और गुनिया सहित बुजुर्ग ज्ञानधारकों तक सीधी पहुंच बनाई जा रही है। विशेष रूप से प्राकृतिक कंद-मूल (जड़ी-बूटियों) और औषधीय वनस्पतियों से सामान्य-असामान्य रोगों के अल्पावधि-दीर्घावधि उपचार से संबंधित जनजातियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे नैसर्गिक ज्ञान और इनके अनुभवों को अभिलेख रूप में विकसित करने की कोशिश की जा रही है।
मुख्यमंत्री ने कहा है कि जनजातीय समुदाय पुराकाल से हमारी सांस्कृतिक विरासत के संवाहक रहे हैं। इनके पास प्राकृतिक और औषधीय वनस्पतियों से जुड़ा अमूल्य देशज ज्ञान भी है। इस ज्ञान का संरक्षण, संवर्धन और वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। हमारी कोशिश है कि प्रदेश के जनजातीय बंधुओं के पास उपलब्ध औषधीय पौधों, खेती-किसानी, वन एवं लोकज्ञान की गूढ़ जानकारियां व अब मौखिक परम्पराओं तक ही सीमित न रहें, बल्कि इनका वैज्ञानिक तरीके से दस्तावेजीकरण हो, ताकि यह ज्ञान अगली पीढ़ी तक भी पहुंचे। हम जनजातियों की देशज ज्ञान-सम्पदा को वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित और दस्तावेजीकृत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि केन्द्र सरकार भी इस दिशा में आगे आई है। केन्द्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ने जनजातीय समुदाय के वैद्यों/चिकित्सकों को औषधीय पौधों, कृषि तथा वनोपज से संबंधित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण, प्रमाणीकरण तथा इसे और भी सुदृढ़ करने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिलाने की एक देशव्यापी पहल शुरू की है। केंद्र सरकार के सहयोग से मध्यप्रदेश में भी जनजातियों के देशी इलाज के समृद्ध ज्ञान के संरक्षण-संवर्धन का कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है। केन्द्र सरकार चला रही ‘नेशनल प्रोग्राम ऑन कैपेसिटी बिल्डिंग ऑफ ट्राइबल हीलर्स’उल्लेखनीय है कि जनजातीय समुदायों के पास पीढ़ियों से संरक्षित पारम्परिक चिकित्सा ज्ञान के अभिलेखीकरण के लिए केन्द्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के बीच हुए एक समझौता ज्ञापन के तहत ‘नेशनल प्रोग्राम ऑन कैपेसिटी बिल्डिंग ऑफ ट्राइबल हीलर्स’संचालित किया जा रहा है। इस राष्ट्रीय कार्यक्रम का प्रमुख लक्ष्य देशभर में जनजातीय समुदायों से जुड़े वैद्यों (ट्राईबल हीलर्स) का 5,000 प्रशिक्षित ‘मास्टर ट्रेनर्स' का कैडर तैयार करना है।
मध्यप्रदेश की तैयारीप्रदेश के इंदौर, जबलपुर, शहडोल, नर्मदापुरम्, रीवा, ग्वालियर-चंबल, भोपाल एवं उज्जैन संभाग के कुल 34 जिलों के करीब 640 जनजातीय वैद्यों (ट्राईबल हीलर्स) को मास्टर ट्रेनर्स के रूप में नामांकित कर इनकी क्षमता निर्माण के लिए विशेष प्रशिक्षण देने का लक्ष्य रखा गया है।
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