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इंदौर के बहुप्रतीक्षित एलिवेटेड कॉरिडोर प्रोजेक्ट को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने स्पष्ट किया कि एलिवेटेड कॉरिडोर का निर्माण करना या नहीं करना शासन का नीतिगत फैसला है, जिसमें न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसका सरोकार केवल जनता की सुविधा और जनहित से जुड़ा हुआ है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि प्रस्तावित एलिवेटेड कॉरिडोर उसी मार्ग पर बनाया जाना है, जहां वर्तमान में बीआरटीएस संचालित है। चूंकि बीआरटीएस को लेकर पहले से ही एक याचिका विचाराधीन है, इसलिए कोर्ट ने दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई करने का निर्णय लिया है। अगली सुनवाई की तारीख 25 फरवरी तय की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि पहले किए गए दो सर्वे में इस प्रोजेक्ट की उपयोगिता को नकारा गया था, जिन पर करीब 30 लाख रुपये खर्च हुए थे और उसी आधार पर शासन ने पहले प्रस्ताव रद्द कर दिया था।
याचिका में प्रोजेक्ट के वित्तीय पक्ष और ट्रैफिक लाभ के दावों पर भी सवाल उठाए गए हैं। कहा गया है कि 60 प्रतिशत यातायात को लाभ होने का दावा किसी सार्वजनिक सर्वे से प्रमाणित नहीं है और न ही नगर निगम व बिजली कंपनी से जुड़े खर्चों की कोई स्पष्ट योजना सामने आई है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की है कि एलिवेटेड कॉरिडोर की निष्पक्षता और उपयोगिता का आकलन कोर्ट की निगरानी में किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराया जाए।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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